चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 4 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8402
आईएसबीएन :978-1-61301-029-7

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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 का ई-पुस्तक संस्करण...

सातवाँ बयान


रात आधी से ज्यादा जा चुकी है। उस लम्बे-चौड़ें खेमें के चारों तरफ बड़ी मुस्तैदी के साथ पहरा फिर रहा है, जिसमें किशोरी, कामिनी और कमला गहरी नींद में सोयी हुई हैं। उसके दोनों बगल और भी दो बड़े-बड़े डेरे हैं, जिनमें लौंडियाँ हैं, और उन दोनों डेरो के चारों तरफ भी दो फौजी सिपाही घूम रहे हैं। मनोरमा चुपचाप अपने बिछावन पर से उठी, कनात उठाकर चोरों की तरह खेमें के नीचे से बाहर निकल गयी, और पैर दबाती हुई किशोरी के खेमे की तरफ चली। दूर से उसने देखा कि चार फौजी सिपाही हाथ में नंगी तलवारें लिये हुए घूम-घूमकर पहरा दे रहे हैं। वह हाथ में तिलिस्मी खंजर लिये हुए खेमे के पीछे चली गयी। जब पहरा देने वाले कुछ आगे निकल गये, तब उसने कदम बढ़ाया और तिलिस्मी खंजर म्यान से निकालकर उनके रास्ते में रख दिया, इसके बाद पीछे हट कर पुनः आड़ में खड़ी हो गयी, तथा पहरा देनेवालों की तरफ ध्यान देकर देखने लगी। जब पहरा देनेवाले लौटकर उस खंजर के पास पहुँचे तो एक की निगाह उस खंजर पर जा पड़ी, जिसका लोहा तारों की रोशनी में चमक रहा था।

उसने झुककर खंजर उठाना चाहा, मगर छूने के साथ ही बेहोश होकर आँधे मुँह जमीन पर गिर पड़ा। उसकी यह अवस्था देख उसके साथियों को भी आश्चर्य हुआ। दूसरे ने झुककर उसे उठाना चाहा और जब खंजर पर उसका हाथ पड़ा तो उसकी भी वही दशा हुई, जो पहिले सिपाही की हुई थी। तिलिस्मी खंजर का हाल और गुण गिने हुए आदमियों को मालूम था और जिन्हें मालूम था, वे भी उसे बहुत छिपाकर रखते थे। बेचारे फौजी सिपाहियों को इस बात की कुछ खबर न थी और धोखे में पड़कर जैसाकि ऊपर लिख चुके हैं एक दूसरे के बाद चारों सिपाही खंजर छू-छूकर बेहोश हो गये। उस समय मनोरमा पेड़ की आड़ से बाहर निकलकर चारों बेहोश सिपाहियों के पास पहुँची, अपना खंजर उठा लिया और उसी खंजर से खेमे के पीछे कनात में बड़ा-सा छेद करने बाद बड़ी होशियारी से खेमे के अन्दर घुस गयी। उस समय किशोरी, कामिनी और कमला गहरी नींद में खुर्राटे ले रही थीं, जिन्हें एकदम दुनिया से उठा देने की फिक्र में मनोरमा लगी हुई थी। मनोरमा उनके सिरहाने की तरफ खड़ी हो गयी और सोचने लगी, ‘‘निःसन्देह इस समय मेरा वार खाली नहीं जा सकता, तिलिस्मी खंजर के एक ही वार में सिर कटकर अलग हो जायगा, मगर एक के सिर कटने की आहट से बाकी की दोनों जग जायँगी, ऐसा न होना चाहिए, इस समय इन तीनों ही को मारना मेरा काम है, अच्छा पहिले इस तिलिस्मी खंजर से इन तीनों को बेहोश कर देना चाहिए।’’ इतना सोचकर मनोरमा ने खंजर बदन से लगाकर उन तीनों को बेहोश कर दिया और फिर सिर काटने के लिए तैयार हो गयी। उसने तिलिस्मी खंजर का एक भरपूर हाथ किशोरी की गर्दन पर जमाया, जिससे सिर कटकर अलग हो गया, दूसरा हाथ उसने कामिनी की गर्दन पर जमाया और उसका सिर काटने के बाद कमला का सिर धड़ से अलग कर दिया, इसके बाद खुशीभरी निगाहों से तीनों लाशों की तरफ देखने लगी और बोली, ‘‘इन्हीं तीनों ने दुनिया में ऊधम मचा रक्खा था। जिस तरह इस समय इन तीनों को मारकर मैं खुश हो रही हूँ उसी तरह बहुत जल्द बीरेन्द्र, इन्द्रजीत, आनन्द और गोपाल को भी मार कर खुशी-भरी निगाहों से उनकी लाशों को देखूँगी। तब दुनिया में मायारानी और मनोरमा के सिवाय कोई भी प्रतापी दिखायी न देगा’’ मनोरमा इतना कह ही चुकी थी कि पीछे की तरह से आवाज आयी-‘‘नहीं नहीं ऐसा न हुआ और न कभी होगा!’’

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