चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 - देवकीनन्दन खत्री Chandrakanta Santati - 4 - Hindi book by - Devkinandan Khatri
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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4

देवकीनन्दन खत्री

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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2011
पृष्ठ :256
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8402
आईएसबीएन :978-1-61301-029-7

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चन्द्रकान्ता सन्तति - 4 का ई-पुस्तक संस्करण...

बारहवाँ बयान


किशोरी, कामिनी और कमला जिस मकान में रक्खी गयी थीं, वह नाम ही को तिलिस्मी मकान था। वास्तव में न तो उस मकान में कोई तिलिस्म था और न किसी तिलिस्म से उसका सम्बन्ध ही था। तथापि वह मकान और स्थान बहुत सुन्दर और दिलचस्प था। ऊँची-ऊँची चार पहाड़ियों के बीच में बीस-बाईस बिघहे के लगभग जमीन थी, जिसमें तरह-तरह के कुदरती गुलबूटे लगे हुए थे, जो केवल जमीन ही की तरावट से सरसब्ज बने रहते थे। पूरब की तरफवाली पहाड़ी के ऊपर से साफ और मीठे जल का झरना गिरता था, जो उस जमीन में चक्कर देता हुआ पश्चिम की तरफ की पहाड़ी के नीचे जाकर लोप हो जाता था और इस सबब से वहाँ की जमीन हमेशा तर बनी रहती थी। बीच में एक छोटा-सा दो मंजिल का मकान बना हुआ था और उत्तर तरफवाली पहाड़ी पर सौ-सवा सौ हाथ ऊँचे जाकर एक छोटा-सा बंगला और भी था। शायद बनाने वाले ने इसे जाड़े के मौसिम के लिए आवश्यक समझा हो, क्योंकि नीचेवाले मकान में तरी ज्यादा रहती थी। किशोरी, कामिनी और कमला इसी बँगले में रहती थीं और उनकी हिफाजत के लिए जो दो-चार सिपाही और लौंड़ियाँ थीं, उन सभों का डेरा नीचेवाला मकान में था, खाने-पीने का सामान तथा बन्दोबस्त भी उसी में था।

उन तीनों की हिफाजत के लिए जो सिपाही और लौंडियाँ वहाँ थी, उन सभों की सूरत भी ऐयारी ढंग से बदली हुई थी और यह बात किशोरी, कामिनी तथा कमला से कह दी गयी थी, जिसमें उन तीनों को किसी तरह का खुटका न रहे।

ये तीनों जानती थी कि ये सिपाही और लौंड़ियाँ हमारी नहीं है, फिर भी समय की अवस्था पर ध्यान देकर, उन्हें इन सभों पर भरोसा करना पड़ता था। इस मकान में आने के कारण इन तीनों की तबीयत बहुत ही उदास थी। रोहतासगढ़ से रवाना होते समय इन तीनों को निश्चय हो गया था कि हम लोग बहुत जल्द चुनारगढ़ पहुँचनेवाले हैं, जहाँ न तो किसी दुश्मन का डर रहेगा और न किसी तरह की तकलीफ ही रहेगी, इससें भी बढ़कर बात यह होगी कि उसी चुनारगढ़ में हम लोगों की मुराद पूरी होगी। मगर निराशा ने रास्ते ही में पल्ला पकड़ लिया और दुश्मन के डर से इन्हें इस विचित्र स्थान में आकर रहना पड़ा, जहाँ सिवाय गैर के अपना कोई भी दिखायी नहीं पड़ता था।

जिस दिन ये तीनों यहाँ आयी थी, उस दिन कृष्णाजिन्न भी यहाँ मौजूद था। ये तीनों कृष्णाजिन्न को बखूबी जानती थीं और यह भी जानती थीं कि कृष्णाजिन्न हमारा सच्चा पक्षपाती तथा सहायक है, तिस पर तेजसिंह ने भी उन तीनों को अच्छी तरह समझाकर कह दिया था कि यद्यपि तुम लोगों को यह नहीं मालूम कि वास्तव में कृष्णाजिन्न कौन है और कहाँ रहता है, तथापि तुम लोगों को उस पर उतना ही भरोसा रखना चाहिए, जितना हम पर रखती हो और उसकी आज्ञा भी उतनी ही इज्जत के साथ माननी चाहिए, जितनी इज्जत के साथ हमारी आज्ञा मानने की इच्छा रखती हो। किशोरी, कामिनी और कमला ने यह बात बड़ी प्रसन्नता से स्वीकार की थी।

जिस समय ये तीनों इस मकान में आयी थीं, उसके दो ही घण्टे बाद सब सामान ठीक करके कृष्णाजिन्न और तेजसिंह चले गये थे और जाती समय इन तीनों को कृष्णाजिन्न कह गये कि तुम लोग अकेले रहने के कारण घबराना नहीं, मैं बहुत जल्दी लक्ष्मीदेवी, कमलिनी और लाडिली को तुम लोगों के पास भेजवाऊँगा और तब तुम लोग बड़ी प्रसन्नता के साथ यहाँ रह सकोगी। मैं भी जहाँ तक जल्द हो सकेगा तुम लोगों को लेने के लिए आऊँगा।

तीसरे ही दिन भैरोसिंह भी उस विचित्र स्थान में जा पहुँचे, जिन्हें देख किशोरी, कामिनी और कमला बहुत खुश हुईं।

हमारे प्रेमी पाठक जानते हैं कि कमला और भैरोसिंह का दिल घुल-मिल कर एक हो रहा था। अस्तु इस समय यह स्थान उन्हीं दोनों के लिए मुबारक हुआ और उन्हीं को यहाँ आने की विशेष प्रसन्नता हुई, मगर उन दोनों को अपने से ज्यादा अपने मालिकों का ख्याल था, उनकी प्रसन्नता के किसी अपनी प्रसन्नता वे नहीं चाहते थे और उनके मालिक भी इस बात को अच्छी तरह जानते थे।

उस स्थान में पहुँचकर भैरोसिंह ने वहाँ के रास्ते की बड़ी तारीफ की और कहा कि इन्द्रदेव के मकान में जाने का रास्ता जैसा गुप्त और टेढ़ा है वैसा ही यहाँ का भी है, अनजान आदमी यहाँ कदापि आ नहीं सकता। इसके बाद भैरोसिंह ने राजा बीरेन्द्रसिंह के लश्कर का हाल बयान किया।

भैरोसिंह की जुबानी लश्कर का हाल और मनोरमा के हाथ से भेष बदली हुई तीनों लौंडियों के मारे जाने की खबर सुनकर किशोरी और कामिनी के रोंगटे खड़े हो गये। किशोरी ने कहा, ‘‘निःसन्देह कृष्णाजिन्न देवता हैं। उनकी अद्भुत शक्ति उनकी बुद्धि और उनके विचार की जहाँ तक तारीफ की जाय उचित है। उन्होंने जोकुछ सोचा ठीक ही निकला!’’

भैरो : इसमें कोई शक नहीं। तुम लोगों को यहाँ बुलाकर उन्होंने बड़ा ही काम किया। मनोरमा तो गिरफ्तार हो गयी और भाग जाने लायक भी न रही और उसके मददगार भी अगर लश्कर के साथ होंगे तो अब गिरफ्तार हुए बिना नहीं रह सकते, इसके अतिरिक्त...

कमला : हम लोगों को मरा जानकर कोई पीछा भी न करेगा और जब दोनों कुमार तिलिस्म तोड़कर चुनारगढ़ में आ जायेंगे, तब तो यही दुनिया हम लोगों के लिए स्वर्ग हो जायगी।

बहुत देर इन चारों में बातचीत होती रही। इसके बाद भैरोसिंह ने वहाँ की अच्छी तरह सैर की और खा-पीकर निश्चिन्त होने बाद इधर-उधर की बातों से उन तीनों का दिल बहलाने लगे, और जब तक वहाँ रहे, उन लोगों को उदास होने न दिया।

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