उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
रतन का मुख इस समय वसंत की प्राकृतिक शोभा की भाँति विंहसित था। ऐसा गर्व, ऐसा उल्लास उसके मुख पर कभी न दिखायी दिया था। मानों उसे संसार की सम्पत्ति मिल गयी है।
हार को गले में लटकाये वह अन्दर चली गयी। वकील साहब के आचार-विचार में नयी और पुरानी प्रथाओं का विचित्र मेला था। भोजन वह अभी तक किसी ब्राह्मण के हाथ का भी नहीं खाते थे। आज रतन उसके लिए अच्छी-अच्छी चीजें बनाने गयी, अपनी कृतज्ञता को वह कैसे ज़ाहिर करें?
रमा कुछ देर तक तो बैठा साहब का योरोप-गान सुनता रहा, अन्त को निराश होकर चल दिया।
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अगर इस समय किसी को संसार में सबसे दुखी, जीवन से निराश, चिन्ताग्नि में जलते हुए प्राणी की मूर्ति देखनी हो, तो उस युवक को देखे, जो साइकिल पर बैठा हुआ, अलफ्रेड पार्क के सामने चला जा रहा है। इस वक्त अगर कोई काला साँप नज़र आये, तो वह दोनों हाथ फैलाकर उसका स्वागत करेगा और उसके विष को सुधा की तरह पियेगा। उसकी रक्षा सुधा से नहीं, अब विष से ही हो सकती है। मौत ही अब उसकी चिन्ताओं का अन्त कर सकती है; लेकिन क्या मौत उसे बदनामी से भी बचा सकती है? सबेरा होते ही, यह बात घर-घर फैल जायेगी–सरकारी रुपया खा गया और जब पकड़ा गया, तब आत्महत्या कर ली ! कुल में कलंक लगाकर, मरने के बाद भी अपनी हँसी कराके चिन्ताओं से मुक्त हुआ तो क्या; लेकिन दूसरा उपाय ही क्या है।
अगर वह इस समय जाकर जालपा से सारी स्थिति कह सुनाये, तो वह उसके साथ अवश्य सहानुभूति दिखायेगी। जालपा को चाहे कितना ही दुःख हो; पर अपने गहनें निकालकर देने में एक क्षण भी विलम्ब न करेगी। गहनों को गिरवी रखकर वह सरकारी रुपये अदा कर सकता है। उसे अपना परदा खोलना पड़ेगा। इसके सिवा और कोई उपाय नहीं है।
मन में यह निश्चय करके रमा घर की ओर चला, पर उसकी चाल में वह तेजी न थी जो मानसिक स्फूर्ति का लक्षण है।
लेकिन घर पहुँचकर उसने सोचा–जब यही करना है, तो जल्दी क्या है, जब चाहूँगा माँग लूँगा। कुछ देर गपशप करता रहा, फिर खाना खाकर लेटा। सहसा उसके जी में आया, क्यों न चुपके से कोई चीज़ उठा ले जाऊँ? कुल मर्यादा की रक्षा करने के लिए एक बार उसने ऐसा ही किया था। उसी उपाय से क्या वह प्राणों की रक्षा नहीं कर सकता है? अपनी जबान से तो शायद वह कभी विपत्ति का हाल न कह सकेगा। इसी प्रकार आगा-पीछा में पड़े हुए सवेरा हो जायेगा। और तब उसे कुछ कहने का अवसर ही न मिलेगा।
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