लोगों की राय

उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास)

ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

438 पाठक हैं

ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


जालपा ने इसका कुछ जवाब न दिया। दफ्तर की कोई बात उनसे न कही। जागेश्वरी सुनकर घबड़ा जाती, और उसी वक्त रोना-पीटना मच जाता। वह ऊपर जाकर लेट गयी और अपने भाग्य पर रोने लगी। रह-रहकर चित्त ऐसा विकल होने लगा, मानो कलेजे में शूल उठ रहा हो। बार-बार सोचती, अगर रात भर न आये, तो कल क्या करना होगा? जब तक कुछ पता न चले कि वह किधर गये, तब तक कोई जाये तो कहाँ जाय? आज उसके मन ने पहली बार स्वीकार किया कि यह सब उसी की करनी का फल है। यह सच है कि उसने कभी आभूषणों के लिए आग्रह नहीं किया; लेकिन उसने कभी स्पष्ट रूप से मना भी तो नहीं किया। अगर गहने चोरी जाने के बाद वह इतनी अधीर न हो गयी होती, तो आज यह दिन क्यों आता। मन की इस दुर्बल अवस्था में जालपा अपने भार से अधिक भार अपने ऊपर लेने लगी। वह जानती थी, रमा रिश्वत लेता है, नोच-खसोटकर रुपये लाता है, फिर भी उसने मना नहीं किया। उसने खुद क्यों अपनी कमली के बाहर पाँव फैलाया? क्यों उसे रोज़ सैर-सपाटे की सूझती थी? उपहारों को ले-लेकर वह क्यों फूली न समाती थी? इस जिम्मेदारी को भी इस वक्त जालपा अपने ही ऊपर ले रही थी। रमानाथ प्रेम के वश होकर उसे प्रसन्न करने के लिए ही तो सब कुछ करते थे। युवकों का यही स्वभाव है। फिर उसने उनकी रक्षा के लिए क्या किया? क्यों उसे यह समझ न आयी कि आमदनी से ज्यादा खर्च करने का दण्ड एक दिन भोगना पड़ेगा। अब उसे ऐसी ही कितनी बातें याद आ रही थीं, जिनसे उसे रमा के मन की विकलता का परिचय पा जाना चाहिए था; पर उसने कभी इन बातों की ओर ध्यान न दिया।

जालपा इन्हीं चिन्ताओं में डूबी हुई न जाने कब तक बैठी रही। जब चौकीदारों की सीटियों की आवाज उसके कानों में आयी, तो वह नीचे जाकर जागेश्वरी से बोली–वह तो अब तक नहीं आये। आप चलकर भोजन कर लीजिए।

जागेश्वरी बैठ-बैठे झपकियाँ ले रही थी। चौंककर बोली–कहाँ चले गये थे?

जालपा–वह तो अब तक नहीं आये।

जागेश्वरी–अब तक नहीं आये ! आधी रात तो हो गयी होगी। जाते वक्त तुमसे कुछ कहा भी नहीं?

जालपा–कुछ भी नहीं।

जागेश्वरी–तुमने तो कुछ नहीं कहा?
जालपा–मैं भला क्या कहती।

जागेश्वरी–तो मैं लालाजी को जगाऊँ?

जालपा–इस वक्त जगाकर क्या कीजिएगा? आप चलकर कुछ खा लीजिए न।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book