उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
जालपा ने शरमाकर कहा–तुम तो मुझे बनाने लगीं। कहाँ तुम कालेज की पढ़ने वाली, कहाँ मैं अनपढ़ गँवार औरत। तुमसे मिलकर मैं अलबत्ता आदमी बन जाऊँगी। जब जी चाहे, यहीं चली आना। यही मेरा घर समझो।
मैंने कहा–तुम्हारे स्वामीजी ने तुम्हें इतनी आजादी दे रक्खी है। बड़े अच्छे खयालों के आदमी होंगे। किस दफ्तर में नौकर हैं?
जालपा ने अपने नाखूनों को देखते हुए कहा–पुलिस में उम्मेदवार हैं।
मैंने ताज्जुब से पूछा–पुलिस के आदमी होकर वह तुम्हें यहाँ आने की आजादी देते हैं?
जालपा इस प्रश्न के लिए तैयार न मालूम होती थी। कुछ चौंककर बोली–वह मुझसे कुछ नहीं कहते...मैंने उनसे यहाँ आने की बात नहीं कही...वह घर बहुत कम आते हैं। वहीं पुलिसवालों के साथ रहते हैं।
उन्होंने एक साथ तीन जवाब दिये। फिर भी उन्हें शक हो रहा था, कि इनमें से कोई जवाब इत्मीनान के लायक नहीं है। वह कुछ खिसियानी-सी होकर दूसरी तरफ ताकने लगी।
मैंने पूछा–तुम अपने स्वामी से कहकर किसी तरह मेरी मुलाकात उस मुखबिर से करा सकती हो, जिसने इन कैदियों के खिलाफ गवाही दी है?
रमानाथ की आँखें फैल गयीं और छाती धक-धक करने लगी।
ज़ोहरा बोली–यह सुनकर जालपा ने मुझे चुभती हुई आँखों से देखकर पूछा–तुम उनसे मिलकर क्या करोगी?
मैंने कहा–तुम मुलाकात करा सकती हो या नहीं, मैं उनसे यही पूछना चाहती हूँ कि तुमने इतने आदमियों को फँसाकर क्या पाया? देखूँगी वह क्या जवाब देते हैं।
जालपा का चेहरा सख्त पड़ गया। वह यह कह सकता है, मैंने अपने फायदे के लिए किया ! सभी आदमी अपना फायदा सोचते हैं। मैंने भी सोचा। जब पुलिस के सैकड़ों आदमियों से कोई यह प्रश्न नहीं करता, तो उससे यह प्रश्न क्यों किया जाय? इससे कोई फायदा नहीं।
मैंने कहा–अच्छा, मान लो तुम्हारा पति ऐसी मुखबिरी करता, तो तुम क्या करतीं?
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