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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


जालपा ने मेरी तरफ सहमी हुई आँखों से देखकर कहा–तुम मुझसे यह सवाल क्यों करती हो, तुम खुद अपने दिल में इसका जवाब क्यों नहीं ढूँढ़ती?

मैंने कहा–मैं तो उनसे कभी न बोलती, न कभी उनकी सूरत देखती।

जालपा ने गम्भीर चिन्ता के भाव से कहा–शायद मैं भी ऐसा समझती–या न समझती–कुछ कह नहीं सकती। आखिर पुलिस के अफसरों के घर में भी तो औरते हैं, वे क्यों नहीं अपने आदमियों को कुछ कहतीं? जिस तरह उनके हृदय अपने मर्दों के से हो गये हैं, संभव है, मेरा हृदय भी वैसा ही हो जाता।

इतने में अँधेरा हो गया। जालपा देवी ने कहा–मुझे देर हो रही है। बच्चे साथ हैं। कल हो सके तो फिर मिलिएगा। आपकी बातों में बड़ा आनन्द आता है।

मैं चलने लगी, तो उन्होंने चलते-चलते मुझसे फिर कहा–जरूर आइएगा। वहीं मैं मिलूँगी आपका इन्तजार करती रहूँगी।

लेकिन दस ही क़दम के बाद फिर रुककर बोलीं–मैंने आपका नाम तो पूछा ही नहीं। अभी तुमसे बातें करने से जी नहीं भरा। देर न हो रही हो तो आओ; कुछ देर गप-शप करें।

मैं तो यही चाहती थी। अपना नाम ज़ोहरा बतला दिया।

रमा ने पूछा–सच !

ज़ोहरा–हाँ, हरज क्या था। पहले तो जालपा भी ज़रा चौंकी, पर कोई बात न थी। समझ गयी बंगाली मुसलमान होगी। हम दोनों उसके घर गयीं। उस ज़रा से कोठरे में न जाने वह कैसे बैठती थीं। एक तिल भी जगह नहीं। कहीं मटके हैं, कहीं पानी, कहीं खाट, कहीं बिछावन। सील और बदबू से नाक फटी जाती थी। खाना तैयार हो गया था। दिनेश की बहू बरतन धो रही थी। जालपा ने उसे उठा दिया–जाकर बच्चों को खिलाकर सुला दो, मैं बरतन धोये देती हूँ, और खुद बरतन माँजने लगीं। उनकी यह खिदमत देखकर मेरे दिल पर इतना असर हुआ कि मैं भी वहीं बैठ गयी और माँजे हुए बरतनों को धोने लगी। जालपा ने मुझे वहाँ से हट जाने के लिए कहा; पर मैं न हटी। बराबर बरतन धोती रही। जालपा ने तब पानी का मटका अलग हटाकर कहा–मैं पानी न दूँगी, तुम उठ जाओ, मुझे बड़ी शर्म आती है, तुम्हें मेरी क़सम हट जाओ, यहाँ आना तो तुम्हारी सज़ा हो गयी, तुमने ऐसा काम अपनी जिन्दगी में क्यों किया होगा। मैंने कहा–तुमने भी तो कभी नहीं किया होगा; जब तुम करती हो, तो मेरे लिए क्या हरज है।

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