उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
जालपा ने कहा–मेरी और बात है।
मैंने पूछा–क्यों? जो बात तुम्हारे लिए है, वही मेरे लिए भी है। कोई महरी क्यों नहीं रख लेती हो?
जालपा ने कहा–महारियाँ आठ-आठ रुपये माँगती हैं।
मैं बोली–मैं आठ रुपये महीना दे दिया करूँगी।
जालपा ने ऐसी निगाहों से मेरी तरफ देखा, जिसमें सच्चे प्रेम के साथ सच्चा उल्लास, सच्चा आशीर्वाद भरा हुआ था। वह चितवन ! आह ! कितनी पाकीजा थी, कितनी पाक करने वाली। उनकी इस बेग़रज़ खिदमत के सामने मुझे अपनी जिन्दगी ज़लील, कितनी काबिले नफ़रत मालूम हो रही थी। उन बर्तनों के धोने में मुझे जो आनन्द मिला, उसे मैं बयान नहीं कर सकती।
बरतन धोकर उठीं, तो बुढ़िया के पाँव दबाने बैठ गयीं। मैं चुपचाप खड़ी थी। मुझसे बोली–तुम्हें देर हो रही हो तो जाओ, कल फिर आना।
मैंने कहा–नहीं, मैं तुम्हें घर पहुँचाकर उधर ही से निकल जाऊँगी।
गरज नौ बजे के बाद वह वहाँ से चली। रास्ते में मैंने कहा–जालपा, तुम सचमुच देवी हो।
जालपा ने छूटते ही कहा–ज़ोहरा, ऐसा मत कहो। मैं खिदमत नहीं कर रही हूँ, अपने पापों का प्रायश्चित्त कर रही हूँ। मैं बहुत दुखी हूँ। मुझसे बड़ी अभागिनी संसार में न होगी।
मैंने अनजान बनकर कहा–इसका मतलब मैं नहीं समझी।
जालपा ने सामने ताकते हुए कहा–कभी समझ जाओगी। मेरा प्रायश्चित्त इस जन्म में न पूरा होगा। इसके लिए मुझे कई जन्म लेने पड़ेंगे।
मैंने कहा–तुम तो मुझे चक्कर में डाले देती हो, बहन ! मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। जब तक तुम इसे समझा न दोगी, मैं तुम्हारा गला न छोड़ूँगी।
जालपा ने एक लम्बी साँस लेकर कहा–ज़ोहरा, किसी बात को खुद छिपाये रहना इससे ज्यादा आसान है कि दूसरों पर वह बोझ रक्खूँ।
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