उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
मैंने आर्त-कंठ से कहा–हाँ, पहली मुलाकात में अगर आपको मुझ पर इतना एतबार न हो, तो मैं आपको इलजाम न दूँगी; मगर कभी-न-कभी आपको मुझ पर एतबार करना पड़ेगा। मैं आपको छोड़ूँगी नहीं।
कुछ दूर तक हम दोनों चुपचाप चलती रहीं। एकाएक जालपा ने काँपती हुई आवाज में कहा–ज़ोहरा, अगर इस वक्त तुम्हें मालूम हो जाये कि मैं कौन हूँ, तो शायद तुम नफ़रत से मुँह फेर लोगी और मेरे साये से भी दूर भागोगी।
इन लफ़्ज़ो में न जाने क्या जादू था कि मेरे सारे रोएँ खड़े हो गये। यह एक रंज और शर्म से भरे हुए दिल की आवाज़ थी और इसने मेरी स्याह जिन्दगी की सूरत मेरे सामने खड़ी कर दी। मेरी आँखों में आँसू भर आये ऐसा जी में आया कि अपना सारा स्वाँग खोल दूँ। न जाने उनके सामने मेरा दिल क्यों ऐसा हो गया था। मैंने बड़े-बड़े काइएँ और छँटे हुए शोहदों और पुलिस-अफसरों को चपर-गट्टू बनाया है; पर उसके सामने मैं जैसे भीगी बिल्ली बनी हुई थी। फिर मैंने जाने कैसे अपने को सँभाल लिया।
मैं बोली तो मेरा गला भरा हुआ था–यह तुम्हारा खयाल गलत है देवी। शायद तब मैं तुम्हारे पैरों पर गिर पड़ूँगी। अपनी या अपनों की बुराइयों पर शर्मिन्दा होना सच्चे दिलों का काम है।
जालपा ने कहा–लेकिन तुम मेरा हाल जानकर करोगी क्या। बस, इतना ही समझ लो कि एक गरीब अभागिन औरत हूँ, जिसे अपने ही जैसे अभागे और गरीब आदमियों के साथ मिलने-जुलने में आनन्द आता है।
‘इसी तरह वह बार-बार टालती रही; लेकिन मैंने पीछा न छोड़ा। आखिर उसके मुँह से बात निकाल ही ली।’
रमा ने कहा–यह नहीं, सब कुछ कहना पड़ेगा।
ज़ोहरा–अब आधी रात तक की कथा कहाँ तक सुनाऊँ। घण्टों लग जायँगे। जब मैं बहुत पड़ी, तो उन्होंने आखिर में कहा–मैं उसी मुखबिर की बदनसीब औरत हूँ, जिसने इन कैदियों पर यह आफ़त ढाई है। यह कहते-कहते वह रो पड़ीं। फिर ज़रा आवाज को सँभालकर बोली–हम लोग इलाहाबाद के रहनेवाले हैं। एक ऐसी बात हुई कि इन्हें वहाँ से भागना पड़ा। किसी से कुछ कहा, न सुना, भाग आये। कई महीनों में पता चला कि वह यहाँ हैं।
रमा ने कहा–इसका भी किस्सा है। तुमसे बताऊँगा कभी। जालपा के सिवा और किसी को यह न सूझती।
ज़ोहरा बोली–यह सब मैंने दूसरे दिन जान लिया। अब मैं तुम्हारे रग-रग से वाकिफ़ हो गयी। जालपा मेरी सहेली है। शायद ही अपनी कोई बात उन्होंने मुझसे छिपायी हो।
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