उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
कहने लगीं–ज़ोहरा मैं बड़ी मुसीबत में फँसी हुई हूँ। एक तरफ तो एक आदमी की जान और कई खानदानों की तबाही है, दूसरी तरफ अपनी तबाही है। मैं चाहूँ, तो आज इन सबों की जान बचा सकती हूँ। मैं अदालत को ऐसा सबूत दे सकती हूँ कि फिर मुख़बिर की शहादत की कोई हकीकत ही न रह जायेगी; पर मुखबिर को सज़ा से नहीं बचा सकती। बहन, इस दुविधे में मैं पड़ी नरक का कष्ट झेल रही हूँ। न यही होता है कि इन लोगों को मरने दूँ, और न यही हो सकता है कि रमा को आग में झोंक दूँ। यह कहकर वह रो पड़ीं और बोली–बहन मैं खुद मर जाऊँगी। पर उनका अनिष्ट मुझसे न होगा। न्याय पर उन्हें भेंट नहीं कर सकती। अभी देखती हूँ, क्या फैसला होता है। नहीं कह सकती, उस वक्त मैं क्या कर बैठूँ। शायद वहीं हाई कोर्ट में सारा किस्सा कह सुनाऊँ, शायद उसी दिन जहर खाकर सो रहूँ।
इतने में देवीदीन का घर आ गया। हम दोनों विदा हुईं। जालपा ने मुझसे बहुत इसरार किया कि कल इसी वक्त फिर आना। दिनभर तो उन्हें बात करने की फुरसत नहीं रहती। बस वही शाम को मौका मिलता था। वह इतने रुपये जमा कर देना चाहती हैं कि कम-से-कम दिनेश के घर वालों को कोई तकलीफ न हो। दो सौ रुपये से ज्यादा जमा कर चुकी हैं। मैंने भी पाँच रुपये दिये। मैंने दो-एक बार जिक्र किया कि आप इन झगड़ों में न पड़िए, अपने घर चली जाइए; लेकिन मैं साफ-साफ कहती हूँ, मैंने कभी ज़ोर देकर यह बात न कही। जब-जब मैंने इशारा किया, उन्होंने ऐसा मुँह बनाया, गोया वह यह बात सुनना भी नहीं चाहतीं। मेरे मुँह से पूरी बात कभी न निकलने पायी। एक बात है, कहो तो कहूँ?
रमा ने मानो ऊपरी मन से कहा–क्या बात है?
ज़ोहरा–डिप्टी साहब से कह दूँ, वह जालपा को इलाहाबाद पहुँचा दें। उन्हें कोई तकलीफ़ न होगी। बस दो औरतें उन्हें स्टेशन तक बातों में लगा ले जायेंगी। वहाँ गाड़ी तैयार मिलेगी, वह उसमें बैठा दी जायेंगी, या कोई और तदबीर सोचो।
रमा ने ज़ोहरा की आँखों से आँख मिलाकर कहा–क्या यह मुनासिब होगा?
ज़ोहरा ने शरमाकर कहा–मुनासिब तो न होगा।
रमा ने चटपट जूते पहन लिये और ज़ोहरा से पूछा–देवीदीन के ही घर पर रहती है न?
ज़ोहरा उठ खड़ी हुई और उसके सामने आकर बोली–तो क्या इस वक्त जाओगे?
रमा–हाँ ज़ोहरा, इसी वक्त चला जाऊँगा। बस उनसे दो बातें करके उस तरफ चला जाऊँगा जहाँ मुझे अब से बहुत पहले चला जाना चाहिए था।
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