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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


ज़ोहरा–मैंने खूब पट्टी पढ़ायी है। उसके जाने की अब ज़रूरत नहीं है। शायद रास्ते पर आ जाय। रमानाथ ने बुरी तरह डाँटा है। उनकी धमकियों से डर गयी है।

दारोग़ा–तुम्हें यक़ीन है कि अब यह कोई शरारत न करेगी?

ज़ोहरा–हाँ, मेरा तो यही खयाल है।

दारोग़ा–तो फिर यह कहाँ गया?

ज़ोहरा–कह नहीं सकती।

दारोगा–मुझे इसकी रिपोर्ट करनी होगी। इन्स्पेक्टर साहब और डिप्टी साहब को इत्तला देना ज़रूरी है। ज्यादा पी तो नहीं गया था?

ज़ोहरा–पिये हुए तो थे।

दारोग़ा–तो कहीं गिर-गिरा पड़ा होगा। इसने बहुत दिक किया ! तो मैं ज़रा उधर जाता हूँ। तुम्हें पहुँचा दूँ, तुम्हारे घर तक?

ज़ोहरा–बड़ी इनायत होगी।

दोराग़ा ने ज़ोहरा को मोटर साइकिल पर बिठा लिया और उसको ज़रा देर में घर के दरवाजे पर उतार दिया; मगर इतनी देर में मन चंचल हो गया। बोले–अब तो जाने का जी नहीं चाहता ज़ोहरा। चलो, आज कुछ गपशप हो। बहुत दिन हुए तुम्हारे करम की निगाह नहीं हुई।

ज़ोहरा ने जीने के ऊपर एक कदम रखकर कहा–जाकर पहले इन्स्पेक्टर साहब से इत्तला तो कीजिए। यह गपशप का मौका नहीं है।

दारोग़ा ने मोटर साइकिल से उतरकर कहा–नहीं, अब न जाऊँगा, ज़ोहरा। सुबह देखी जायेगी। मैं भी आता हूँ।

ज़ोहरा–आप मानते नहीं हैं। शायद डिप्टी साहब आते हों। आज उन्होंने कहला भेजा था।

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