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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


दारोग़ा–मुझे चकमा दे रही हो ज़ोहरा। देखो इतनी बेवफाई अच्छी नहीं।

ज़ोहरा ने ऊपर चढ़कर द्वार बन्द कर लिया और ऊपर जाकर खिड़की से सिर निकालकर बोली–आदाब अर्ज।

 [५०]

दारोग़ा घर जाकर लेट रहे। ग्यारह बज रहे थे। नींद खुली, तो आठ बज गये थे। उठकर बैठे ही थे कि टेलीफोन पर पुकार हुई। जाकर सुनने लगे। डिप्टी साहब बोल रहे थे–इस रमानाथ ने बड़ा गोलमाल कर दिया है। उसे किसी दूसरी जगह ठहराया जायेगा। उसका सब सामान कमिश्नर साहब के यहाँ भेज देना होगा। रात को वह बँगले पर था या नहीं?

दारोगा ने कहा–जी नहीं, रात मुझसे बहाना करके अपनी बीवी के पास चला गया था।

टेलीफोन–तुमने उसको जाने क्यों दिया? हमको ऐसा डर लगता है, कि उसने जज से सब हाल कह दिया है। मुकदमा का जाँच फिर से होगा। आपसे बड़ा भारी ब्लंडर हुआ है। सारा मेहनत पानी में फिर गया। उसको जबरदस्ती रोक लेना चाहिए था।

दारोग़ा–तो क्या वह जज साहब के पास गया था?

डिप्टी–हाँ साहब, वहीं गया था, और जज भी कायदा को तोड़ दिया। वह फिर से मुकदमा का पेशी करेगा। रमा अपना बयान बदलेगा। अब इसमें कोई डाउट नहीं है और यह सब आप की बंगलिंग है। हम सब उस बाढ़ में बह जायेगा। ज़ोहरा भी दगा दिया।

दारोग़ा उसी वक्त रमानाथ का सब सामान लेकर पुलिस-कमिश्नर के बँगले की तरफ चले। रमा पर ऐसा गुस्सा आ रहा था पावें तो समूचा ही निगल जायें। कम्बख्त को कितना समझाया, कैसी-कैसी खातिर की; पर दग़ा कर ही गया। इसमें ज़ोहरा का भी साँठ-गाँठ है। बीवी की डाँट-फटकार करने का महज़ बहाना था। ज़ोहरा बेगम की तो आज ही खबर लेता हूँ। कहाँ जाती हैं। देवीदीन से समझूँगा।

एक हफ्ते तक पुलिस-कर्मचारियों में जो हलचल रही उसका ज़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं। रात की रात और दिन के दिन इसी फिक्र में चक्कर खाते रहे थे। अब मुकदमें से कहीं ज्यादा अपनी फिक्र थी। सबसे ज्यादा घबराहट दारोग़ा को थी। बचने की कोई उम्मीद नहीं नज़र आती थी। इन्स्पेक्टर और डिप्टी–दोनों ने सारी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर डाल दी और खुद बिल्कुल अलग हो गये।

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