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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


इस मुकदमें की फिर पेशी होगी, इसकी सारे शहर में चर्चा होने लगी। अँग्रेजी न्याय के इतिहास में यह घटना सर्वथा अभूतपूर्व थी। कभी ऐसा नहीं हुआ। वकीलों में इस पर कानूनी बहसें होतीं। जज साहब ऐसा कर भी सकते हैं? मगर जज दृढ़ था। पुलिसवालों ने बड़े-बड़े ज़ोर लगाये, पुलिस कमिश्नर ने यहाँ तक कहा कि इससे सारा पुलिस विभाग बदनाम हो जायेगा; लेकिन जज ने किसी की न सुनी। झूठे सबूतों पर पन्द्रह आदमियों की जिन्दगी बरबाद करने की जिम्मेदारी सिर पर लेना उसकी आत्मा के लिए असह्य था। उसने हाई कोर्ट को सूचना दी और गवर्नमेंट को भी।

इधर पुलिसवाले रात-दिन रमा की तलाश में दौड़-धूप करते थे; लेकिन रमा न जाने कहाँ जा छिपा था कि उसका कुछ पता ही न चलता था।

हफ्तों सरकारी-कर्मचारियों में लिखा-पढ़ी होती रही। मानो काग़ज स्याह कर दिये गये। उधर समाचार पत्रों में इस मामले पर नित्य आलोचना होती रहती थी एक पत्र ने जालपा से मुलाका़त की और उसका बयान छाप दिया। दूसरे ने ज़ोहरा का बयान छाप दिया। इन दोनों बयानों ने पुलिस की बखिया उधेड़ दी। ज़ोहरा ने तो लिखा था कि मुझे पचास रुपये रोज इसलिए दिये जाते थे कि रमानाथ को बहलाती रहूँ और उसे कुछ सोचने या विचार करने का अवसर न मिले। पुलिस ने इन बयानों का पढ़ा, तो दाँत पीस लिये। ज़ोहरा और जालपा, दोनों कहीं और जा छिपीं, नहीं तो पुलिस ने जरूर उनकी शरारत का मजा चखाया होता।

आखिर दो महीने के बाद फैसला हुआ। इस मुकदमें पर विचार करने के लिए एक सिविलियन नियुक्त किया गया। शहर के बाहर एक बँगले में विचार हुआ, जिसमें ज्यादा भीड़-भाड़ न हो। फिर भी रोज दस-बारह आदमी जमा हो जाते थे। पुलिस ने ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया कि मुल्जि़मों में कोई मु़खबिर बन जाये; पर उसका उद्योग सफल न हुआ। दारोग़ाजी चाहते तो नयी शहादतें बना सकते थे; पर अपने अफ़सरों की स्वार्थपरता पर वह इतने खिन्न हुए कि दूर से तमाशा देखने के सिवा और कुछ न किया। जब सारा यश अफ़सरों को मिलता है और सारा अपयश मातहतों को, तो दारोग़ाजी को क्या गरज पड़ी थी कि नयी शहादतों की फ़िक्र में सिर खपाते। इस मुआमले में अफ़सरों ने सारा दोष दारोग़ा ही के सिर मढ़ा। उन्हीं की बेपरवाही से रमानाथ हाथ से निकला। अगर ज्यादा सख्ती से निगरानी की जाती, तो जालपा कैसे उसे खत लिख सकती, और वह रात को कैसे उससे मिल सकता।

ऐसी दशा में मुक़दमा उठा लेने के सिवा और क्या किया जा सकता था। तबेले की बला बन्दर के सिर गयी। दारोगा तनज्जुल हो गये और नायब-दारोगा का तराई में तबादला कर दिया गया।

जिस दिन मुल्ज़िमों को छोड़ा गया, आधा शहर उनका स्वागत करने को जमा था। पुलिस ने दस बजे रात को उन्हें छोड़ा; पर दर्शक जमा हो ही गये। लोग जालपा को भी खींच ले गये। पीछे-पीछे देवीदीन भी पहुँचा। जालपा पर फूलों की वर्षा हो रही थी और ‘जालपा देवी की जय !’ से आकाश गूँज रहा था।

मगर रमानाथ की परीक्षा अभी समाप्त न हुई थी। उस पर दरोग़-बयानी का अभियोग चलाने का निश्चय हो गया।

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