कहानी संग्रह >> हिन्दी की आदर्श कहानियाँ हिन्दी की आदर्श कहानियाँप्रेमचन्द
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प्रेमचन्द द्वारा संकलित 12 कथाकारों की कहानियाँ
मैं हँस दिया। मैंने कहा–‘सकही, कानपुर चलोगी?’ वह कुछ न बोली। मैं चलने को ही था कि अचानक कौतूहलवश एक प्रश्न मेरे मन में उदित हुआ जो बहुत दिनों से मुझे विकल कर रहा था। मैंने पूछा–‘सकही, यह तो बतला कि तू रघुबर से तो प्रेम नहीं करती, परन्तु कुंकुम से तेरा इतना स्नेह क्यों है? तेरा फूटा शीशा कहाँ है?’
‘बाबू, यह न पूछो। फूटा शीशा और कुंकुम मेरे पास अब भी है। उससे किसी का कोई संबंध नहीं।’ इतना कहते-कहते उसके मन में उन्माद दौड़ गया। वह तिलमिला-सी गयी। ‘बाबू, अब मैं जाती हूँ’ इतना कहकर उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना ही बड़े वेग से हजरतगंज की ओर भागती हुई चली गयी। मैं खड़ा ही रह गया।
यह मेरा अपमान न था। फूटे शीशे और कुंकुम के नाम से ही उसे किसी ऐसी गहरी ठेस का स्मरण हुआ कि सारी सजग परिस्थितियाँ विचार-बवंडर में पड़कर किसी अज्ञात प्रदेश में एक नये कौतूहल की सृष्टि हुई। कानपुर लौटकर मैंने सकही का जीवन-वृत्तांत विस्तारपूर्वक जानने का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु कोई विशेष जानकारी प्राप्त न हो सकी। रघुबर भी कुछ न बता सका। वह केवल बुरा-भला कहता रहा। उसमें सकही का समाचार सुनकर तनक भी उत्कंठा जागृत न हुई। प्रत्युत्त ऐसा प्रतीत होता था कि वह इस बात से भयभीत है कि कहीं सकही कानपुर न आ जाय।
सारा संसार संतुष्ट है और सारा संसार असंतुष्ट। प्रत्येक प्राणी को इस खिचड़ी का भाग मिलता है। कहीं दाल अधिक, कहीं भात अधिक। मेरे भाग में असंतोष अधिक है। इस असंतोष में सकही के इतिहास का कौतूहल बड़ा महत्त्व रखता था। मैंने उसके पूर्व जीवन के संबंध में बड़ी खोज की, परन्तु बहुत दिनों तक कोई सफलता न हुई।
एक दिन सरकार की ओर से जनसंख्या की गणना हो रही थी। बेकार व्यक्तियों का एक समुदाय गणकों के पीछे घूम रहा था। रघुबर के घर में किसी ने सकही का भी नाम लिखा दिया था। सकही के पिता का नाम अधीन तेली लिखा था। जब निरीक्षण के दिन सकही का कोई पता न लगा, तो गणकों और श्यामू की बहू में कुछ हँकरा-तुकारी होने लगी। कालिका की नानी भी कुछ बड़बड़ा रही थी। मैंने ऊपर से यह विवाद सुना। मेरे बीच में पड़ने से मामला शांत हो गया। मुझे एक नये तत्त्व का पता लगा कि झुरही अधीन की लड़की है।
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