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उपन्यास >> गंगा और देव

गंगा और देव

आशीष कुमार

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :407
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 9563
आईएसबीएन :9781613015872

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आज…. प्रेम किया है हमने….


पर हाय रे नसीब? हाय रे तकदीर? हाय रे समय की माँग?

देव रूक न सकता था किसी भी सूरत में। देव को जाना ही होगा किसी भी हालत में। युवती जान गई कि देव अब उसे जीवन के इस मोड़ पर छोड़कर चला जाएगा। पर फिर भी उसने सिर हिलाकर न जाने की विनती की।

पर समय ही सर्वाधिक बलवान होता है.... आज! देव ने जाना। देव की ये 12 घण्टों की यात्रा जैसे 12 मिनटों में पूरी हो गयी थी। देव ने महसूस किया। मैंने भी.....

देव उठ खड़ा हुआ। उसने अपना हाथ अपने लाल बैग ही ओर बढ़ाया और वो स्थान छोड़ने की तैयारी की। देव ने एक लम्बी, गहरी साँस ली, अपनी सारी शक्ति एकत्रित की और युवती को देखा अन्तिम बार।

युवती अत्यधिक बुद्विमान थी। उसने तुरन्त ही अपनी पतली-पतली, लम्बी-लम्बी गोरी-गोरी उंगलियों को अपने सुन्दर गुलाबी ओंठों पर रखा और नीचे बैठे यात्रियों से बचते हुए देव को एक फलाइंग किस दी मीठी वाली!

देव मुस्करा उठा। देव का चेहरा जो फीका पड़ चुका था अचानक सूरज की तरह चमकने लगा जैसे देव के गले में किसी ने सुगन्धित फूलों वाली वरमाला डाल दी हो। मैंने तुलना की....

पर ये क्या? देव इस फलाइंग किस का जवाब न दे सका।

क्यों? क्यों? क्यों?..... क्यों भाई? मेरे मन में प्रश्न उठा

.... क्योंकि ये था भारत! एक नैतिक मूल्योंवाला परम्परावादी देश, कोई अमेरिका या यूरोप नहीं जहाँ लोग खुल्लम-खुल्ला पब्लिक प्लेस पर प्रेम का इजहार करते हैं, शर्म और हया के साथ जीते हैं। जहाँ हर चीज को परदे में रखा जाता है। मैंने जाना....

देव बाहर चला गया। देव ने ट्रेन छोड़ दी। युवती निराश हो गयी जो शायद कुछ समय पहले संसार में सबसे अधिक खुशी का अनुभव कर रही थी।

ट्रेन छुक! छुक! छुक! करती हुई गोरखपुर की ओर बढ़ चली। देव को अच्छा न लगा। जैसे बुरा लगा। वहीं दूसरी ओर युवती की आँखों में आँसू थे। मैनें देखा।

पर लगातार दोनों एक दूसरे के बारें में सोच रहे थे। विचार कर रहे थे। दोनों एक दूसरे से बिछड़ गये थे पर फिर भी एक दूसरे से प्यार कर रहे थे। से भौतिक प्रेम नहीं आात्मिक प्रेम था जिसमें दूसरे व्यक्ति का पास में होना जरूरी ना था। इस प्रकार के

प्रेम को कहतें है आत्माओं का प्रेम! आज देव ने जाना। मैंने भी.....

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