उपन्यास >> कंकाल कंकालजयशंकर प्रसाद
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कंकाल भारतीय समाज के विभिन्न संस्थानों के भीतरी यथार्थ का उद्घाटन करता है। समाज की सतह पर दिखायी पड़ने वाले धर्माचार्यों, समाज-सेवकों, सेवा-संगठनों के द्वारा विधवा और बेबस स्त्रियों के शोषण का एक प्रकार से यह सांकेतिक दस्तावेज हैं।
कहने वाला बाथम था। उसके
साथ भय-विह्वल घण्टी नाव पर चढ़ गयी। डाँड़े गिरा दिये गये।
इधर
नवाब का सिर कुचलकर जब विजय ने देखा, तब वहाँ घण्टी न थी, परन्तु एक
स्त्री खड़ी थी। उसने विजय का हाथ पकड़कर कहा, 'ठहरो विजय बाबू!' क्षण-भर
में विजय का उन्माद ठंडा हो गया। वह एक बार सिर पकड़कर अपनी भयानक
परिस्थिति से अवगत हो गया।
निरंजन दूर से यह कांड
देख रहा था। अब अलग रहना उचित न समझकर वह भी पास आ गया। उसने कहा, 'विजय,
अब क्या होगा?'
'कुछ नहीं, फाँसी होगी और
क्या!' निर्भीक भाव से विजय ने कहा।
'आप इन्हें अपनी नाव दे
दें और ये जहाँ तक जा सकें, निकल जायें। इनका यहाँ ठहरना ठीक नहीं।'
स्त्री ने निरंजन से कहा।
'नहीं यमुना! तुम अब इस
जीवन को बचाने की चिंता न करो, मैं इतना कायर नहीं हूँ।' विजय ने कहा।
'परन्तु
तुम्हारी माता क्या कहेंगी विजय! मेरी बात मानो, तुम इस समय तो हट ही जाओ,
फिर देखा जायेगा। मैं भी कह रहा हूँ, यमुना की भी यही सम्मति है। एक क्षण
में मृत्यु की विभीषिका नाचने लगी! लड़कपन न करो, भागो!' निरंजन ने कहा।
विजय
को सोचते-विचारते और विलम्ब करते देखकर यमुना ने बिगड़कर कहा, 'विजय बाबू!
प्रत्येक अवसर पर लड़कपन अच्छा नहीं लगता। मैं कहती हूँ, आप अभी-अभी चले
जायें! आह! आप सुनते नहीं?'
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