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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


भारती बोली, “आपसे अच्छा डॉक्टर कौन मिलेगा?”

डॉक्टर ने मजाक में उत्तर दिया, “तब तो हो चुकी अच्छी। अभ्यास छूटे बहुत दिन बीत चुके हैं। फिर बैठा-बैठा किसी का इलाज करता रहूं, इतना समय कहां है मेरे पास?”

भारती बोल उठी, “आपके पास भला समय कहां है! कोई मर भी जाए तो भी आपको समय नहीं मिलगा। क्या देश का काम ऐसा ही होता है?”

डॉक्टर का हंसता हुआ चेहरा पलभर को गम्भीर होकर फिर पहले जैसा हो गया। भारती यह देखते ही अपनी गलती समझ गई। सुमित्रा कौन है? डॉक्टर के साथ उसका सबंध क्या है? और किस तरह वह इस दल में शामिल हुई, भारती को इस सबंध में कुछ भी मालूम नहीं था। इन लोगों की संस्था में व्यक्तिगत परिचय के प्रति जिज्ञासा निषिद्ध माना जाता है। इसीलिए अनुमान के सिवा ठीक तौर से कुछ भी जान लेने का उपाय नहीं था। केवल स्त्री होने के नाते ही उसने सुमित्रा का मनोभाव कुछ-कुछ जान लिया था। लेकिन अपनी उसी अनुभूति को आधार मानकर इतना बड़ा इशारा कर बैठने से वह केवल संकोच में ही नहीं पड़ गई बल्कि भयभीत भी हो उठी। भयभीत वह डॉक्टर से नहीं सुमित्रा से हुई। यह बात किसी भी तरह उसके कान तक पहुंच जाने से काम बिगड़ जाएगा। उनका और परिचय मालूम न होने पर भी पहले से ही उस शांत, तीक्ष्ण, विद्या-बुद्धिशालिनी रमणी के दुर्भेद्य गम्भीरता के परिचय से कोई भी अपरिचित नहीं था। उनके स्वरूप और भाषण से उनके प्रखर सौन्दर्य के हर पदक्षेप से, उनके संयम-गम्भीर वार्तालाप से, उनके अचंचल आचरण की गम्भीरता से, इस दल में रहते हुए भी उनकी असीम दूरी को सब लोग भली-भांति अनुभव करते थे। यहां तक कि उनकी बीमारी के संबंध में भी अपने आप किसी प्रकार की आलोचना करने का भी किसी को साहस नहीं होता था।

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