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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
लेकिन एक दिन इस न बेधी जाने वाली कठोरता को बेधकर उनकी अत्यंत गुप्त दुर्बलता, उस दिन अपूर्व और भारती के सामने प्रकट हो गई थी जिस दिन एक आदमी को विदा करते समय सुमित्रा स्वयं को संभाल नहीं सकी थीं। और उसी से वह मानो अपने को सबसे अलग-बहुत दूर हटा ले गई हैं। वह विशाल व्यवधान, दूसरे की बिन मांगी सहानुभूति के आकर्षण से संकुचित होने का थोड़ा भी आभास मिलते ही उसकी अपने जीवन के प्रति अंतर में छिपी गूढ़ वेदना सहसा भड़क उठेगी, इस बात का अनुभव करके भारती का क्षुब्ध चित्त आशंका से भर जाता था।
डॉक्टर ने आराम कुर्सी पर अच्छी तरह लेटकर अपने दोनों पैर मेज पर फैला दिए और फिर आराम की सांस छोड़कर बोल उठे, “ओह....।”
भारती आश्चर्य से बोले, “आप तो खूब सो लिए?”
डॉक्टर नाराज होकर बोलें, “क्यों, क्या मैं घोड़ा हूं जो जरा-सा लेटते ही नींद आ जाएगी? मुझे नींद आ रही है। तुम लोगों की तरह खड़े-खड़े मैं नहीं सो सकता।”
“खड़े-ख़ड़े हम लोग भी नहीं सो सकते। लेकिन अगर कोई यह कहे कि आप दौड़ते-दौड़ते सो सकते हैं तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। आपके इस शरीर से क्या कुछ नहीं हो सकता कोई नहीं जानता, लेकिन समय हो गया। इसी समय न चल पड़ने से गाड़ी नहीं मिलेगी। चली जाएगी।”
“चली जाने दो, बड़ी जोर की नींद आ रही है भारती। आंखें नहीं खोल सकता,” यह कहकर डॉक्टर ने आंखें मूंद लीं।
यह सुनकर भारती ने पुलकित मन से अनुभव किया कि केवल मेरे अनुरोध से ही आज उनका जाना स्थगित हो गया। नहीं तो नींद तो दूर, बिजली गिरने की दुहाई देकर भी उनके संकल्प में बाधा नहीं डाली जा सकती। उसने कहा, “अगर सचमुच ही नींद आ रही हो तो ऊपर जाकर सो जाइए न।”
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