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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने आंखें बंद किए ही पूछा, “तुम क्या अपूर्व की बाट देखती हुई सारी रात जागकर बिताओगी?”
भारती बोली, “मुझे क्या गरज? कोठरी में सो जाऊंगी।”
डॉक्टर बोले, “क्रोध करके लेटा तो जा सकता है लेकिन सोया नहीं जा सकता। बिछौने पर पड़कर छटपटाते रहने से बढ़कर दूसरी कोई सजा नहीं होती। इससे यही अच्छा होगा कि तुम उसे खोज लाओ। मैं किसी से नहीं कहूंगा।”
भारती का चेहरा लाल पड़ गया। कुछ देर मौन रहने के बाद स्वयं को संभाल कर बोली, “अच्छा डॉक्टर साहब, बिस्तर पर पड़कर छटपटाते रहने से बढ़कर और कोई सजा नहीं होती-यह बात आप कैसे जान गए?”
“लोग कहते हैं। वही सुनकर।”
“अपने अनुभव से नहीं जानते?”
डॉक्टर बोले, “बहिन, हम अभागों को तो सोने के लिए बिस्तर भी नसीब नहीं होते। फिर छटपटाना कैसा। इतनी बाबूगिरी के लिए फुर्सत कहां?”
भारती बोली, “अच्छा डॉक्टर साहब, सब लोग कहते हैं कि आप में क्रोध है ही नहीं। क्या यह बात सच है?”
“लोग झूठ कहते हैं। वह मुझे देख नहीं सकते।”
भारती हंसकर बोली, “या अत्यधिक प्यार करते हैं? वह तो यह भी कहते हैं कि आप में न मान है न अभिमान। न दया-माया है। हृदय आदि से अंत तक पत्थर बन गया है।”
डॉक्टर ने कहा, “यह भी अत्यधिक प्यार की बात है। इसके बाद?”
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