|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती बोली, “इसके बाद, उस प्रस्तर मूर्ति पर केवल एक प्रतिमा खुदी हुई है-जन्मभूमि की प्रतिमा। उसका न आदि है, न अंत है और न क्षय है। वह प्रतिमा हमें दिखाई नहीं देती। इसीलिए हम लोग आपके पास रह पाते हैं। नहीं तो....” कहते-कहते सहसा वह रुक गई। फिर बोली, “कैसे बताऊं डॉक्टर साहब, एक दिन जब में सुमित्रा बहिन के साथ बर्मा आयरन कम्पनी के कारखाने के पास से जा रही थी, उस दिन यहां कारखाने के नए बायलर की परीक्षा हो रही थी। लोग खड़े-खड़े तमाशा देख रहे थे। काले पर्वत के समान वह एक विशाल जड़-पिंड से अधिक और कुछ भी नहीं था। सहसा उसका दरवाजा खुल जाने पर ऐसा लगा मानों उसके भीतर आग का तूफान उठ रहा है। अगर उसमें इस पृथ्वी को भी उठाकर डाल दिया जाए तो वह इसे भी भस्म कर देगा। मैंने सुना है कि वह अकेला ही उस विशाल कारखाने को जला सकता है। दरवाजा बंद हो गया तो वह पूर्ववत शांत जड़-पिंड बन गया। उसके भीतर का रत्ती भर भी प्रकाश बाहर नहीं रहा। सुमित्रा बहिन के मुंह से गहरी सांस निकल गई। मैंने आश्चर्य से पूछा “क्या बात है जीजी!” सुमित्रा ने कहा, “इस भयंकर यंत्र को याद रखना भारती। इससे तुम अपने डॉक्टर साहब को पहचान सकोगी। यही है उनकी यथार्थ प्रतिमूर्ति।”
डॉक्टर ने अन्यमनस्क की तरह मुस्कराते हुए कहा, “सभी लोग क्या मुझे प्यार ही करते हैं? लेकिन नींद के मारे तो आंखों से अब कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा भारती। कुछ उपाय करो। लेकिन इससे पहले - वह आदमी कहां चला गया, क्या एक बार पता नहीं लगाओगी?”
“लेकिन आप यह बात किसी से कह नहीं सकते।”
“नहीं। लेकिन मुझ से लज्जा करने की आवश्यकता नहीं है।”
“नहीं। मनुष्य से ही मनुष्य को लज्जा होती है, “यह कहकर वह लालटेन लेकर बाहर चली गई।
|
|||||

i 








