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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
लगभग पंद्रह मिनट बाद आकर बोली, “अपूर्व बाबू चले गए।”
आश्चर्य से डॉक्टर बोले, “इतने अंधेरे में अकेले?”
“ऐसा ही लगता है।”
“आश्चर्य है।”
“मैंने आपके लिए बिस्तर ठीक कर दिया है।”
“और तुम।”
“मैं फर्श पर कम्बल बिछाकर सो जाऊंगी।”
डॉक्टर बोले, “अच्छा चलो। लज्जा मनुष्य मनुष्य से करता है। मैं तो पत्थर रहा।”
ऊपर के कमरे में डॉक्टर लेट गए। भारती ने फर्श पर बिस्तर बिछा दिया।
डॉक्टर ने उसे देखकर कहा, “सब लोग मिलकर इस तरह मेरी उपेक्षा करते हैं तो मेरे आत्म सम्मान को चोट लगती है। यानी मुझसे कोई भय नहीं है।”
भारती बोली, “रत्ती भर भी नहीं। आपसे किसी का लेशमात्र भी अकल्याण नहीं हो सकता।”
डॉक्टर से हंसकर बोली, “अच्छा, किसी दिन पता चल जाएगा।”
बिछौने पर लेटकर भारती ने पूछा, “आपका सव्यसाची नाम किसने रखा था डॉक्टर साहब?”
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