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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


डॉक्टर हंसकर बोले, “यह नाम दिया था पाठशाला में पंडित जी ने। उनके यहां आम का एक बहुत ऊंचा पेड़ था। केवल मैं ही ढेले मारकर उस पर लगे आमों को तोड़ सकता था। एक छत पर से कूदने पर मेरा दायां हाथ मोच खा गया। डॉक्टर ने उस पर पट्टी बांधकर मेरे गले से लटका दिया। यह देखकर सभी हाय-हाय करने लगे। लेकिन पंडित जी ने प्रसन्न होकर कहा, “जाने दो, ढेले की चोट खाने से मेरे आम तो बच गए। पकने पर शायद दो-चार मुंह में डाल सकूंगा।”

भारती बोली, “आप बड़े दुष्ट थे।”

डॉक्टर बोले, दूसरे दिन फिर आम गिराने लगा। पंडित जी को पता चल गया। उन्होंने मुझे पकड़ लिया। कुछ देर मेरी ओर देखकर बोले, “गलती हुई बेटा सव्यसाची। आम की आशा अब नहीं करता। दायां हाथ तोड़ चुके हो, बायां हाथ चल रहा है। बायां हाथ टूट जाने पर संभव है दोनों पैर चलेंगे। अब कष्ट मत करो। जो आम बचे हैं उन्हें मैं तुड़वा देता हूं।”

भारती बोली, “पंडित जी का दिया हुआ नाम है यह?”

डॉक्टर बोले, “हां, मेरा असली नाम तभी से लोग भूल गए।”

भारती फिर बोली, “अच्छा, सभी लोग जो कहते हैं कि देश और आप मिलकर एकाकार हो गए हैं। यह कैसे हुआ?”

डॉक्टर बोले, “यह भी बचपन की घटना है। इस बीच में क्या-क्या आया और चला गया, लेकिन वह दिन आज भी याद है। हमारे गांव के पास वैष्णवों का एक मठ था। एक दिन रात के समय डाकुओं ने उस मठ पर आक्रमण किया। रोने-धोने की आवाज से लोग इकट्ठे हो गए। लेकिन डाकुओं के पास एक देशी बंदूक थी, जिससे वह लोग गोलियां चलाने लगे। यह देखकर कोई उनके पास न जा सका। मेरे एक चचेरे भाई थे। अत्यंत साहसी और परोपकारी। वह जाने के लिए छटपटाने लगे। लेकिन जाने पर निश्चय ही मृत्यु होगी, यह सोचकर सबने उनको पकड़ लिया। अपने को किसी तरह न छुड़ा सकने पर वह वहीं से निष्फल उछल-कूद मचाने लगे और डाकुओं को गाली देने लगे, लेकिन उसका कोई फल नहीं हुआ। डाकुओं ने केवल एक बंदूक के जोर से दो-तीन सौ आदमियों के सामने बाबा जी को खूंटे में बांधकर जला डाला। मैं उस समय बालक था भारती! लेकिन आज भी मरते हुए बाबा जी की चीखें सुनाई पड़ती हैं। ओह, कितना हृदय विदारक आर्तनाद था वह।”

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