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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने पूछा, “इसके बाद?”
डॉक्टर बोले, “इसके बाद?”
डॉक्टर बोले, “बाबा जी को समूचे गांववालों के सामने मार डाला गया। डाकुओं ने लूटपाट का काम बड़ी आसानी से पूरा कर लिया। जाते समय डाकुओं के सरदार ने अपने पिता की सौगंध खाकर बड़े भैया को सुनाकर कहा, “आज तो हम लोग थक गए हैं। पर एक महीने के अंदर ही लौटकर हम इसका बदला लेंगे।” बड़े भैया जिला मजिस्ट्रेट के पास जाकर रोए-धोए कि मुझे एक बंदूक चाहिए। लेकिन पुलिस ने कहा, नहीं मिल सकती। क्योंकि दो साल पहले किसी अत्याचारी पुलिस इंस्पेक्टर के कान मल देने के अपराध में उन्हें दो महीने की जेल की सजा मिल चुकी थी। भैया से मजिस्ट्रेट ने कहा, “जो इतना डरता है वह घर-द्वार बेचकर मेरे जिले से किसी दूसरे जिले में चला जाए।”
भारती उत्तेजित होकर बोली, “नहीं दी?”
डॉक्टर ने कहा, “नहीं, और यही नहीं, बडे भैया ने जब धनुष-बाण और बरछा बनवाया तो पुलिस उन्हें भी छीन ले गईं।”
“इसके बाद?”
“इसके बाद की घटना संक्षिप्त है। उसी महीने में सरदार ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली। इस बार उसके पास एक बंदूक और थी। घर के सभी लोग भाग गए। पर बडे भैया को कोई भी डिगा न सका। डाकू की गोली खाकर उन्होंने प्राण त्याग दिए।”
“प्राण त्याग दिए?”
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