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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
“हां, गोली लगने के बाद चार घंटे जीवित रहे। गांव भर इकट्ठा होकर हो-हल्ला मचाने लगा। कोई डाकुओं को गाली देने लगा। कोई साहब को। केवल भैया चुपचाप पड़े रहे। देहाती गांव ही तो था। अस्पताल दस-बारह कोस दूर था। रात के समय डॉक्टर पट्टी बांधने के लिए आया तो भैया ने उसका हाथ हटाकर कहा, “रहने दो, मैं जीना नहीं चाहता।” यह कहते-कहते पत्थर के उस देवता की आवाज जरा-सी कांप उठी। बड़े भैया मुझे बहुत ही प्यार करते थे। मुझे रोते देखकर उन्होंने मेरी ओर देखा और फिर धीरे-धीरे बोले, “छि:! लड़कियों की तरह इस गाय, भेड़, बकरियों के सुर-में-सुर मिलाकर तू मत रो शैल! लेकिन राज्य करने के लोभ से जिन लोगों ने समूचे देश में मनुष्य कहलाने योग्य एक भी प्राणी बाकी नहीं छोड़ा, उन लोगों को अपने जीवन में कभी क्षमा मत करना?” घृणा से उसके मुंह से उफ, आह तक भी नहीं निकली और इस अभिशप्त पराधीन देश को चिरकाल के लिए वह छोड़कर चले गए। केवल मैं ही जानता हूं भारती- कितना बड़ा और विशाल हृदय उस दिन संसार से विदा हो गया।”
भारती चुपचाप बैठी रही। किसी समय एक छोटे से गांव में हुई दुर्घटना की कहानी ही तो है। डाका पड़ने पर दो-चार अज्ञात, अप्रसिद्ध आदमियों के प्राण नष्ट हुए, इतना ही तो। जगत के बड़े-बड़े विरोधों के असहनीय दु:खों के मुकाबले में यह है क्या चीज? फिर भी इस पत्थर पर कितना गहरा घाव कर गई है। तुलना और गणना की दृष्टि से दुर्बलों के दु:खद इतिहास में हत्या की यह निर्ममता बहुत ही तुच्छ है। इस बंगदेश में ही रोजाना न जाने कितने लोग चोर-डाकुओं के हाथों मरते हैं। लेकिन इसमें क्या इतनी ही-सी बात है? क्या यह पत्थर इतने से आघात से ही विदीर्ण हो गया है? भारती को सहसा लगा, जैसे समूची बलि की दुस्सह लांछना और अपमान की ग्लानि से उस पत्थर के चेहरे पर काली स्याही की मोटी तह पोत दी है।
वेदना से भारती बोल उठी, “भैया....?
डॉक्टर ने गर्दन उठाकर पूछा, “मुझे बुला रही हो?”
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