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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती बोली, “हां.... क्या अंग्रेजों से तुम्हारी संधि नहीं हो सकती?”
“नहीं, मुझसे बढ़कर उनका शत्रु और कोई नहीं है।”
भारती मन-ही-मन दु:खी होकर बोली, “किसी से दुश्मनी या किसी का अहित करने की तुम कामना कर सकते हो, यह बात मैं सोच भी नहीं सकती भैया।”
डॉक्टर बोले, “भारती, यह बात तुम्हारे मुंह से ही शोभा दे सकती है। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम सुखी होओ।” यह कहकर वह जरा हंस पड़े। लेकिन भारती जानती थी कि इस हंसी का कोई मूल्य नहीं है। शायद यह कुछ और ही हो।
डॉक्टर ने कहा, “भारती, हमारा देश उनके हाथों में चला गया है। इसी कारण मैं उनका शत्रु नहीं हूं। कभी यह देश मुसलमानों के हाथों में भी चला गया था लेकिन समस्त संसार में मानवता की इतनी बड़ी शत्रु जाति और कोई नहीं है। यही इन लोगों का व्यवसाय है। यही इनका मूलधन है। यदि तुमसे बन सके तो देश के सभी लोगों को, भले ही वह पुरुष हों या स्त्री, इस सत्य को समझा देना।”
भारती मौन बैठी न जाने क्या सोचने लगी। लेकिन एक समूची जाति के विरुद्ध इतने बड़े अभियोग को सत्य मानकर उस पर विश्वास न कर पाई।
भारती के दल के एक आदमी ने आकर एक पत्र दिया। पत्र सुमित्रा के हाथ का लिखा हुआ था। पत्र में उसने लिखा था कि जैसी अवस्था में हो तत्काल पत्र वाहक के साथ चली आओ।
नीचे उतरकर देखा, दरवाजे के सामने परिचित गाड़ी खड़ी है लेकिन गाड़ीवान बदल गया है। लेकिन गाड़ी क्यों आई है? सुमित्रा के घर तक जाने में तीन-चार मिनट से अधिक समय नहीं लगता। उसने पूछा, “क्या बात है हीरा सिंह, सुमित्रा कहां हैं?”
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