|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
हीरा सिंह पथ के दावेदार के सदस्य न होते हुए भी विश्वासपात्र है, पंजाबी सिख है। पहले हांगकांग पुलिस में सर्विस करता था। अब रंगून के तार घर में प्यून का काम करता है।
उसने धीरे से कहा, “चार-पांच मील दूर, बहुत ही गुप्त और आवश्यक सभा हो रही है। आपके न जाने से काम नहीं चलेगा।”
भारती ने प्रश्न नहीं किया। सांझ के अंधेरे में गाड़ी की खिड़कियां बंद करके चल पड़ी। हीरा सिंह सरकारी प्यून की यूनिफार्म में सरकारी साइकिल पर सवार होकर दूसरे रास्ते से चल पड़ा।
रात के लगभग दस बजे गाड़ी एक बगीचे में पहुंचकर रुक गई। हीरा सिंह पहले ही पहुंच चुका था। उसने गाड़ी का दरवाजा खोल दिया। सिर के ऊपर बड़े-बड़े पेड़ छाए हुए थे। जिसके कारण अंधकार इतना दुर्भेद्य हो गया था कि हाथ सुझाई नहीं दे रहा था। लम्बी-लम्बी और घनी घास के बीच एक पगडंडी का चिन्ह मात्र दिखाई दे रहा था। इसी भयानक रास्ते पर हीरा सिंह अपनी साइकिल की छोटी-सी लालटेन की रोशनी से रास्ता दिखाते हुए आगे-आगे चलने लगा।
उस पगडंडी पर चलते ही भारती के मन में रह-रहकर यह विचार आने लगा कि इस भयंकर स्थान में आकर मैंने अच्छा नहीं किया।
थोड़ी देर बाद वह लोग एक टूटी-फूटी पुरानी इमारत के सामने पहुंच गए। बडे हाल के कोने में ऊपर चढ़ने की सीढ़ियां हैं। सीढ़ियां काठ की बनी हुई हैं। बीच-बीच में सीढ़ियों के कुछ तख्ते नहीं हैं। भारती हीरा सिंह का हाथ पकड़कर दूसरी मंजिल पर पहुंच गई। और फिर सामने का बरामदा पार करके बड़ी कठिनाई से निश्चित स्थान पर पहुंच गई। कमरे में एक चटाई बिछी थी। एक ओर दो मोमबत्तियां जल रही थीं। उन्हीं के पास सामने आसन पर सुमित्रा बैठी थी। दूसरे छोर पर डॉक्टर बैठे थे। उन्होंने स्नेह भरे स्वर में कहा, “आओ भारती, मेरे पास आकर बैठो।”
|
|||||

i 








