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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
“निर्णय?” भारती व्याकुल होकर बोली, “यह न हो सकेगा। आप मेरे साथ चलिए।” लेकिन यह कहते ही भारती सुमित्रा की तरह उदास हो गईं। फिर धीरे से बोली, “तुम्हारी मुझे बहुत जरूरत है भैया।”
“मैं जानता हूं। अपूर्व बाबू, क्या परसों जहाज से घर जा सकेंगे?”
अपूर्व बोला, “जा सकूंगा।”
भारती बोली, “भैया मुझे घर जाना होगा।”
डॉक्टर बोले, “नहीं। तुम्हारे कागज-पत्र, 'पथ के दावेदार' का खाता पिस्तौल-कारतूस-नवतारा सब हटा चुकी होगी। सुबह तलाशी में देशी शराब की बोतल और टूटा हुआ बेहला, पुलिस के साहब को इसके अलावा और कुछ हाथ नहीं लगेगा। कल नौ-दस बजे के लगभग घर लौटकर रसोई तैयार करके खाने-पीने के बाद तुम्हें जरा-सा सो रहने के लिए भी शायद समय मिल जाएगा। रात को दो-तीन बजे के लगभग फिर मिलूंगा। कुछ खाने-पीने को रखना।”
भारती चुप रही। मन-ही-मन बोली, इस तरह अत्यधिक सजग न होने पर क्या इस मरणयज्ञ में कोई साथ आना चाहता है?
“भैया, तुम सबके हित-अहित की चिंता रखते हो। संसार में मेरा अपना कोई नहीं है। अपने पथ के दावेदार से मुझे विदा मत कर देना भैया।”
अंधेरे में ही डॉक्टर ने बारबार सिर हिलाकर कहा, “भगवान के काम से किसी को विदा कर देने का अधिकार किसी को नहीं है लेकिन इसकी धारा तुम्हें बदल देनी पड़ेगी।”
भारती ने कहा, “तुम्हीं बदल देना।”
डॉक्टर ने इसका उत्तर नहीं दिया। सहसा व्यग्र होकर बोले, “भारती, अब मेरे पास समय नहीं है। मैं जा रहा हूं।” यह कहकर पलक झपकते ही अंधेरे में गुम हो गए।
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