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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
स्थान की कमी के कारण गाड़ी में दोनों एक-दूसरे से सटकर बैठे थे। एक घंटे तक गाड़ी घरघराती हुई चलती रही। लेकिन दोनों में कोई बातचीत नहीं हुई। गाड़ी आकर अपूर्व के घर के दरवाजे पर रुक गई। भारती दरवाजा खोलकर अपूर्व के साथ उतर आई। उसने गाड़ीवान से पूछा, “कितना किराया हुआ?”
गाड़ीवान ने हंसकर कहा, “नाट ए पाई - गुडनाइट टू यू।” यह कहकर गाड़ी हांकता हुआ चला गया।
भारती ने पूछा, “तिवारी है?”
“हां।”
ऊपर जाकर, दरवाजा खटखटाकर अपूर्व ने तिवारी को जगाया। किवाड़ खोलकर दीपक की रोशनी में तिवारी की नजर सबसे पहले भारती पर पड़ी। अपूर्व कल ऑफिस गया था और आज भोर की बेला में घर लौटा है रात बिता कर। साथ में भारती है। इसलिए तिवारी को समझने के लिए कुछ बाकी नहीं रहा। क्रोध से उसका सम्पूर्ण शरीर जलने लगा और बिना कुछ कहे वह तेजी से अपने बिस्तर पर जाकर चादर ओढ़ कर सो गया।
तिवारी भारती को बहुत प्यार करता था। एक दिन इसी ने उसे आसन्न मृत्यु के मुंह से बचाया था। इसलिए ईसाई होने पर भी श्रद्धा की दृष्टि से देखता था। लेकिन इधर कुछ दिनों से जो परिस्थिति उत्पन्न हुई थी उससे तिवारी के मन में अपूर्व के संबंध में तरह-तरह की संभव-असंभव समझकर दुश्चिन्ताएं जग उठी थीं। यहां तक कि जाति नष्ट होने तक की। सर्वनाश की वह मूर्ति आज एकदम तिवारी के मन पटल पर साकार अंकित हो उठी।
उसे इस तरह सो जाते देख अपूर्व ने पूछा, “किवाड़ बंद नहीं किए तिवारी?”
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