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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती बोली, “मैं बंद कर देती हूं।”
अपूर्व ने अपने सोने के कमरे में जाकर देखा, बिछौना ज्यों-का-त्यों पड़ा है।
भारती बोली, “आप आराम कुर्सी पर बैठिए। मैं सब ठीक कर देती हूं।”
अपूर्व ने पुकारा, 'तिवारी, एक गिलास पानी ला दे।”
पानी की सुराही और गिलास की ओर इशारा करके बिछौना बिछाती हुई भारती बोली, “सोते हुए आदमी को क्यों जगाते हैं अपूर्व बाबू, आप ही ले लीजिए।”
एक ही सांस में गिलास खाली करके अपूर्व बैठने जा रहा था कि भारती ने कहा, “अब वहां नहीं, बिछौने पर सो जाइए।”
अपूर्व शांत बालक की तरह लेट गया। मसहरी डालकर भारती उसे चारों ओर से दबाने लगी तो अपूर्व ने पूछा, “तुम कहां सोओगी?”
भारती ने आराम कुर्सी की ओर उंगली उठाकर कहा, “सवेरा होने में अब घंटा भर रह गया है। आप सो क्यों नहीं जाते?”
अपूर्व ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “वहां नहीं, मेरे पास बैठो।”
“आपके पास?” भारती के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। अपूर्व और चाहे जैसा भी हो, इन मामलों में वह कभी आत्म विस्मृत नहीं होता था। कितनी ही रातें उन्होंने एक कमरे में बिताई थीं। लेकिन मर्यादा के विरुद्ध उसके आचरण से कोई इशारा या बात प्रकट नहीं हुई थी।
अपूर्व ने कहा, “यह देखो, उन लोगों ने मेरा हाथ तोड़ दिया, तुम मुझे इन लोगों के बीच क्यों खींच ले गईं।”
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