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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
उसकी बात का अंतिम अंश सहसा रुलाई से रुंध गया। भारती मसहरी को एक ओर से उठाकर उसके पास बैठ गई। जांच करके उसने देखा, कसकर बांधने के कारण हाथों में जगह-जगह काली नसें उभरकर फूल आई हैं। अपूर्व की आंखों में से आंसू गिर रहे थे। भारती ने आंचल से उन्हें पोंछकर सांत्वना भरे स्वर में कहा, “डर की कोई बात नहीं। मैं तौलिया भिगोकर लपेट देती हूं। दो-एक दिन में सब ठीक हो जाएगा।”
यह कहकर वह उठ गई और स्नान घर से एक अंगोछा भिगोकर ले आई और उसे हाथ पर बांधकर बहुत ही कोमल स्वर में बोली, “जरा सो जाने की कोशिश कीजिए, मैं आपके माथे पर हाथ फेर देती हूं।” यह कहकर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगी।
अपूर्व बोला, “कल जहाज मिलता तो कल ही चला जाता।”
भारती बोली, “परसों ही चले जाइएगा।”
“गुरुजनों की बात न मानने का फल है। मां ने मुझे मना किया था।”
“मां शायद आपको आने देना नहीं चाहती थीं।”
“लेकिन मैंने अनसुना कर दिया। उसी का यह फल हुआ। होनहार होकर रहता है। दुर्गा-दुर्गा कहते हुए परसों जहाज पर बैठ जाऊं,” कहकर उसने लम्बी सांस ली।
लेकिन इसके साथ ही दूसरे व्यक्ति ने जो उसकी सांस की अपेक्षा सैकड़ों गुना गहरी सांस ली, वह उसे नहीं जान सका।
अपूर्व बोला, “इस मकान में पांव धरते ही तुम्हारे पिता से झगड़ा हुआ, अदालत में जुर्माना हुआ। मुझे इसी से चेत जाना चाहिए था।”
भारती चुप रही।
“तिवारी ने मुझे बार-बार सावधान किया। पांच सौ रुपए महीने की नौकरी चली गई। इस उम्र में कितने लोग पाते हैं। फिर यह हाथ मैं लोगों के सामने दिखाऊंगा कैसे?”
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