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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने कहा, “तुमको मैं मरने नहीं दे सकती। सुमित्रा मरने दे सकती है, लेकिन मैं नहीं। मैं भारत की मुक्ति चाहती हूं - निष्कपट और निस्संकोच भाव से। दुर्बल, पीड़ित और भूखे-नंगे भारतवासियों के लिए अन्न-वस्त्र चाहती हूं। स्वाधीनता के आनंद का उपभोग करना चाहती हूं। इतने बड़े सत्य तक पहुंचने के लिए इस निर्मम कार्य के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है, मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती। विश्व भ्रमण करके तुमने केवल इसी मार्ग को जाना है। सृष्टि के आरम्भ से आज तक के स्वाधीनता के सैकड़ों तीर्थयात्रियों के पद चिन्ह ही तुम्हारी दृष्टि में स्पष्ट हो उठे हैं। लेकिन विश्व मानव की एकांत सदबुद्धि की धारा क्या इस प्रकार समाप्त हो गई है कि इस रक्त रेखा के अतिरिक्त किसी मार्ग का चिन्ह कभी दिखाई ही नहीं देगा? ऐसा निष्ठुर विधान किसी प्रकार भी सत्य नहीं हो सकता। भैया, मानव की इतनी बड़ी परिपूर्णता तुम्हारे अतिरिक्त मैंने और कहीं भी नहीं देखी। निष्ठुरता के बहु प्रचलित मार्ग पर अब तुम मत चलो। वह द्वार शायद आज भी बंद है। उसे हम लोगों के लिए खोल दो। विश्व के समस्त प्राणियों को प्यार करते हुए हम तुम्हारा अनुसरण करते हुए बढ़ते रहें।”
भारती के सिर पर हाथ रखकर, दो-चार बार थपकियां देकर डॉक्टर बोले, “अब समय नहीं है बहिन, मैं जा रहा हूं।”
“कोई उत्तर नहीं दोगे भैया?”
“भगवान तुम्हारा भला करें,” उत्तर में बस इतना कहकर डॉक्टर धीरे-धीरे बाहर निकल गए।
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