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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती चुप रही। आज एक बात तक न कहकर अपूर्व चला गया। नौकरी करने बर्मा आया था। थोड़े दिनों का ही तो परिचय था।
वह ब्राह्मण का सदाचारी लड़का है। उसका देश है, समाज है, घर-द्वार है, आत्मीय-स्वजन हैं। और भी क्या-क्या है। और भारती ईसाई की लड़की है। उसका देश नहीं। घर नहीं। माता-पिता नहीं। अपना कहने के लिए कोई भी नहीं है।
पास ही पेड़-पौधों के बीच हल्की-सी रोशनी दिखाई देने लगी। डॉक्टर ने इशारा करके कहा, “यहीं मेरा डेरा है। खूब आजाद था। पता नहीं कैसी माया में जकड़ गया हूं। तुम्हारे लिए ही चिंता में पड़ा हूं। तुम्हें एक निरापद आश्रय मिल गया है, काश! जाने से पहले इतना ही देख लेता।”
भारती आंसू पोंछकर बोली, “मैं तो अच्छी हूं भैया।”
डॉक्टर ने एक लम्बी सांस लेकर कहा, “कहां अच्छी तरह हो बहिन। मेरे एक आदमी ने आकर बताया कि तुम घर में नहीं हो। सोचा, तुम्हें जेटी पर पा सकूंगा। वहां जाने पर तुमसे भेंट न को सकी। अभागा तुम्हारा चैन लेकर ही नहीं भागा, तुम्हारा साहस भी छीन ले गया है।”
इस बात का पूरा अर्थ न समझकर भारती चुप ही रही।
डॉक्टर ने कहा, “उस दिन रात को निश्चिंत मन से मेरे लिए बिछौना छोड़कर तुम नीचे सो गई थीं। तुमने हंसकर कहा था-भैया, तुम क्या इन्सान हो जो तुमसे डर लगेगा। तुम सो जाओ। लेकिन आज वह साहस नहीं रहा। अपूर्व निर्भय करने योग्य मनुष्य नहीं है। फिर भी वह पास ही था। इसलिए शायद ऐसी आशंका तुम्हारे मन में कल भी पैदा नहीं हुई। आश्चर्य तो यह है कि तुम जैसी लड़की की भय मुक्त स्वाधीनता को भी उस जैसा असमर्थ मनुष्य इतनी आसानी से तोड़कर जा सकता है!”
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