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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती मीठे स्वर में बोली, “लेकिन उपाय क्या है भैया?”
“उपाय शायद न हो। लेकिन बहिन, तुम्हारे चरित्र पर संदेह करने वाला आज कोई नहीं है। फिर अगर तुम्हारा ही मन रात-दिन स्वयं पर संदेह करता रहे तो तुम जीओगी कैसे?”
इस तरह अपने हृदय का विश्लेषण करके देखने का समय भारती के पास नहीं था। उसकी श्रद्धा और आश्चर्य की सीमा न रही, लेकिन वह मौन ही रही।
डॉक्टर बोले, “मैं एक और लड़की को जानता हूं। वह रूसी है लेकिन उसकी बात जाने दो। कब तुम लोगों की भेंट होगी नहीं जानता। लेकिन लगता है एक दिन जरूर होगी। भगवान करे कि न हो। तुम्हारे प्रेम की तुलना नहीं है। वहां से अपूर्व को कोई हटा नहीं सकेगा। लेकिन स्वयं को उसके ग्रहण करने योग्य बनाए रखने की आज से जो अत्यंत सतर्कतापूर्ण जीवनव्यापी साधना आरम्भ होगी, उसकी प्रतिदिन के असम्मान की ग्लानि तुम्हारे मनुष्यत्व को एकदम छोटा बना देगी भारती। जहां ऐसे शुद्ध-पवित्र हृदय का मूल्य नहीं वहां मन को इसी तरह बहलाना पड़ता है। कौन जाने भाग्य में उतने दिनों तक जीवित रहने का समय मेरे लिए है या नहीं। लेकिन यदि हो दीदी तो बहिन कहकर गर्व करने के लिए सव्यसाची के पास कुछ भी शेष नहीं रहेगा।”
भारती ने पूछा, “तो तुम मुझे क्या करने को कहते हो? तुमने ही तो मुझसे बार-बार संसार में लौट जाने को कहा था।”
“लेकिन सिर नीचा करके जाने को नहीं कहा था।”
“लेकिन स्त्रियों का ऊंचा सिर तो कोई भी पसंद नहीं करता।”
“तब मत जाना।”
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