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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने हंसकर कहा, “तुम निश्चिंत रहना भैया, मेरा जाना नहीं हो सकेगा। सारे रास्तों को अपने हाथ से बंद करके केवल एक रास्ता खोल रखा था, वह भी आज बंद हो गया, यह तुम देख आए हो। अब जो रास्ता तुम मुझे दिखा दोगे उसी रास्ते से चलूंगी। मेरी केवल इतनी-सी प्रार्थना स्वीकार कर लेना कि अपने भयंकर रास्ते पर मुझे मत बुलाना। भगवान के समान अप्राप्य वस्तु को पाने के भी जब इतने मार्ग हैं तब तुम्हारे लक्ष्य तक पहुंचने के लिए रक्तपात के अतिरिक्त क्या दूसरा मार्ग नहीं है? मेरा दृढ़ विश्वास है कि मानव की बुद्धि बिल्कुल समाप्त नहीं हो गई है। कहीं-न-कहीं दूसरा मार्ग अवश्य ही है। आज से मैं उसी पथ की खोज में निकलूंगी। भीषण दु:ख क्या है - उस रात को मुझे उसका पता लग गया था जिस रात तुम लोग उनकी हत्या करने के लिए तैयार हो गए थे।”
डॉक्टर ने कहा, “यही मेरा डेरा है,” यह कहकर छोटी नाव को किनारे पर ठेलकर वह उतर पड़े। फिर हाथ में लालटेन लेकर रास्ता दिखाते हुए बोले, “जूते उतारकर आओ। पैरों में कीचड़ लगेगी।”
भारती चुपचाप उतर आई। सागौन के चार-पांच मोटे-मोटे खूंटों पर पुराने और बेकार तख्तों से काठ का एक मकान बना था। टूटी-फूटी लकड़ी के सीढ़ी से रस्सी पकड़कर ऊपर पहुंचने पर जब सात-आठ वर्ष के लड़के ने आकर दरवाजा खोला तो भारती आश्चर्य से अवाक् रह गई। अंदर पांव रखते ही देखा, फर्श पर चटाई बिछाए कम उम्र की एक बर्मी स्त्री सो रही है। तीन-चार बच्चे जहां-तहां पडे हुए हैं। एक असहनीय दुर्गंध से कमरे का वायुमंडल विषाक्त हो उठा है। फर्श पर चारों ओर भात, मछली के कांटे और प्याज-लहसुन के छिलके पड़े हैं। पास ही दो-तीन कालिख लगी मिट्टी की छोटी-छोटी हंडिया पड़ी हैं।
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