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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर के पीछे-पीछे भारती दूसरे कमरे में पहुंच गई। कहीं भी किसी सामान का झमेला नहीं। फर्श पर चटाई बिछी थी। एक ओर दरी लपेटकर रखी हुई थी। डॉक्टर ने दरी झाड़कर बिछाते हुए भारती से बैठने के लिए कहा। बर्मी स्त्री ने कुछ पूछा। डॉक्टर ने बर्मी भाषा में ही उसका उत्तर दिया। थोड़ी देर बाद ही वह लड़का एक तश्तरी में थोड़ा-सा भात, प्याली में तरकारी और पत्ते पर थोड़ी-सी झुलसी हुई मछली रखकर चला गया। अपनी लालटेन के प्रकाश में उन खाद्य वस्तुओं को देखते ही भारती की तबियत मिचलाने लगी।
डॉक्टर ने कहा, “भूख तो शायद तुम्हें भी लगी होगी। लेकिन यह सब।”
भारती ने कहा, “नहीं, नहीं, अभी नहीं।”
यह ईसाई जात-पांत नहीं मानती, लेकिन जहां से जिस प्रकार यह चीजें लाई गई हैं उस स्थान को वह आते समय ही देख आई थी।
डॉक्टर बोले, “लेकिन मुझे बड़ी भूख लगी है बहिन। पहले पेट भर लूं,” यह कहकर हाथ धोकर बड़ी प्रसन्न मुद्रा में खाने बैठ गए।
भारती उस ओर देख नहीं सकी। घृणा और छाती के भीतर की असीम रुलाई की वेदना से उसने मुंह फेर लिया मानो सैकड़ों धाराओं में बहकर निकलने की इच्छा करने लगी। हाय रे देश! हाय रे स्वाधीनता की प्यास! संसार में इन लोगों ने अपना कहकर कुछ भी शेष नहीं रखा। यह घर, यह भोजन, यह घृणित संबंध, जंगली पशुओं जैसा जीवन-पल भर के लिए भारती को मृत्यु भी इससे अधिक अच्छी और सुखद दिखाई दी। मृत्यु को तो बहुतेरे सहन कर सकते हैं लेकिन यह तो तन और मन को निरंतर सताते रहना, इच्छानुसार हर पल आत्महत्या की ओर ले जाना - इस सहिष्णुता की स्वर्ग या मृत्यु में क्या कहीं कोई तुलना है।
पराधीनता की पीड़ा ने क्या इन लोगों के जीवन के सभी पीड़ा-बोध को पूरी तरह धोकर साफ कर दिया है? कहीं कुछ भी शेष नहीं?
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