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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


उसे अपूर्व की याद आ गई उसे अपनी नौकरी छूट जाने का शोक, मित्र-मंडली में हाथ का काला दाग दिखाई देने की लज्जा.... यह ही तो भारत माता की सहस्र कोटि संतानें हैं। खाते-पहनते, परीक्षाएं पास करके, नौकरी में सफलता पाकर, जिनका जन्म से मृत्यु तक का सारा जीवन अत्यंत निर्विघ्न रूप से एक-सा बीतता जा रहा था - और एक है यह व्यक्ति जो अत्यंत निर्विकार, मन से अत्यंत तृप्तिपूर्वक भात निगल रहा है। पल भर के लिए भारती को लगा कि हिमालय के हजारों प्रस्तर खंडों के तिलमात्र हिस्से से भी अधिक वह लोग नहीं हैं और उन्हीं लोगों में से एक प्यार करके, उसी के घर की गृहिणी बनने से वंचित होने के दु:ख से आज वह अपनी छाती फाड़-फाड़कर मर रही है।

सहसा वह दृढ़ता भरे स्वर में बोली, “भैया तुम्हारा चुना हुआ यह खून-खराबी का मार्ग किसी भी तरह ठीक नहीं है। अतीत के भले ही कितने भी उदाहरण दो, जो अतीत है, जो बीत चुका है, वही चिरकाल तक भविष्य की छाती रौंदकर उसे नियंत्रित करता रहेगा, यह विघ्न मानव जीवन के लिए किसी भी तरह सत्य नहीं माना जा सकता। तुम्हारे मार्ग को नहीं लेकिन तुम्हारा सब कुछ विसर्जित करने वाली देश-सेवा को मैं आज अपने सिर पर उठा लेती हूं। अपूर्व बाबू सुख से रहें, अब मैं उनके लिए शोक नहीं करूंगी। आज मैंने अपने जीवन का मंत्र अपनी आंखों से देख लिया है।

डॉक्टर ने आश्चर्य से मुंह उठाकर भात खाते-खाते अस्फुट स्वर में पूछा, “क्या हुआ भारती?”

हाथ-मुंह धोकर डॉक्टर बैठ गए। उसी बर्मी लड़के ने एक बहुत मोटा चुरुट पीते हुए कमरे में प्रवेश किया और कुछ देर नाक-मुंह से धुआं निकालकर फिर वही चुरुट डॉक्टर के हाथ में देकर चला गया।

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