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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


डॉक्टर ने हंसते हुए कहा, “इसी तरह मुफ्त पा लेने पर मैं संसार में किसी भी चीज को छोड़ना पसंद नहीं करता भारती। अपूर्व के चाचा जी ने जब रंगून में गिरफ्तार किया था तब मेरी जेब में से गांजे की चिलम निकल पड़ी थी। वह न होती तो शायद मुझे छुटकारा भी न मिलता।” कहकर वह मुस्कुराने लगे।

भारती यह बात सुन चुकी थी। बोली, “हजार बार छुटकारा न मिलने पर भी तुम गांजा नहीं पीते, यह मैं जानती हूं। लेकिन यह मकान किसका है?”

“मेरा।”

“और यह बर्मी स्त्री-बच्चे?”

डॉक्टर हंसकर बोले, “यह सब मेरे एक मुसलमान मित्र की सम्पति हैं। मेरी ही तरह वह भी फांसी के मुजरिम हैं। इस समय कहीं बाहर गए हैं। परिचय न हो सकेगा।”

भारती बोली, “परिचय के लिए मैं व्याकुल नहीं हूं। लेकिन जिस तरह तुमने इस स्वर्गपुरी में आकर आश्रय लिया है, इससे तो अच्छा था कि मुझे मेरे घर पहुंचा आते भैया। यहां तो मेरा दम घुटा जा रहा है।”

डॉक्टर-”यह स्वर्गपुरी तुम्हें अच्छी नहीं लगेगी, मैं जानता था। लेकिन तुमसे कहने के लिए मेरे पास जितनी बातें हैं वह किसी दूसरे स्थान पर नहीं कही जा सकती थीं भारती! थोड़ा-सा कष्ट आज तुम्हें सहना ही पड़ेगा।”

भारती बोली, “क्या तुम किसी दूसरी जगह जा रहे हो?”

डॉक्टर बोले, “हां, उत्तर और पूर्व के देशों में एक बार घूम आना होगा। लौटने में शायद दो वर्ष लग जाएं। लेकिन आज की रात के बाद फिर तुमसे मिल सकूंगा, यह भरोसा नहीं।”

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