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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर कुछ देर चुप रहे। भारती ने समझ लिया कि इसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। इस रात की समाप्ति के साथ ही वह इस संसार में अकेली रह जाएगी।
डॉक्टर बोले, 'मुझे दक्षिण चीन के केंटन के भीतर और भी आगे पैदल ही जाना पड़ेगा। उस रास्ते से काम के सिलसिले में अगर अमेरिका न पहुंच पाया तो प्रशांत महासागर के द्वीपों में घूमकर फिर इसी देश में लौटकर आश्रय लूंगा। उसके बाद जब तक आग न लगेगी यहीं रहूंगा? और बहिन अगर लौटकर न आ सका तो खबर तो तुम्हें मिल ही जाएगी।”
इस व्यक्ति के शांत, सहज कंठ की बातें कितनी साधारण हैं लेकिन उनका चेहरा भारती की आंखों के सामने नाच उठा। कुछ देर चुप रहकर बोली, “चीन देश में पैदल जाना कितना भयानक काम है, यह मैं सुन चुकी हूं। लेकिन मैं तुमको डर दिखलाना नहीं चाहती। अगर यहां से निकल जाना ही चाहते हो तो फिर यहीं क्यों लौट आना चाहते हो? तुम्हारी अपनी जन्म-भूमि में क्या तुम्हारे लिए कोई काम नहीं है?”
“उसी के काम के लिए तो मैं इस देश को छोड़कर जा रहा हूं। इस देश में स्त्रियां स्वतंत्र हैं। स्वतंत्रता का मार्ग वह समझेंगी। उन लोगों की मुझे बहुत जरूरत है। अगर कभी इस देश में आग जलती देखी तो मेरी बात याद कर लेना, कि उस आग को स्त्रियां ही जला रही हैं। याद रहेगी यह बात?”
भारती ने कहा, “लेकिन मैं तो तुम्हारे पथ की पथिक नहीं हूं।”
डॉक्टर बोले, “यह मैं जानता हूं, लेकिन बड़े भाई की बात याद करने में तो कोई दोष नहीं है। भैया की बीच-बीच में याद तो आ जाएगी।”
भारती बोली, “बड़े भैया की याद आने के लिए मेरे पास बहुत-सी चीजें हैं। इसी तरह शायद तुम मनुष्यों को अपने कुमार्ग में खींच लाया करते हो भैया, लेकिन मुझे नहीं खींच सकते।”
वह सहसा उठ खड़ी हुई। समेटी दरी झाड़कर बिछा दी। फिर बांस के मचान पर कम्बल, तकिया आदि उतारकर अपने हाथ से बिस्तर बिछाते हुए बोली, “अपूर्व बाबू के जहाज के चक्के आज मुझे जिस मार्ग का संकेत दे गए हैं मेरा एक मात्र मार्ग अब वही है। फिर जिस दिन भेंट होगी उस दिन तुम भी स्वीकार करोगे।”
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