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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर व्यग्र होकर बोल उठे, “तुमने अचानक यह क्या शुरू कर दिया भारती? क्या इस फटे कम्बल को मैं खुद नहीं बिछा सकता था। इसकी तो कोई जरूरत थी ही नहीं।”
भारती बोली, “तुमको जरूरत नहीं थी, लेकिन मुझे तो थी। फिर स्त्रियों के जीवन में इसकी भी जरूरत न रहे तो किस बात की जरूरत है, बता सकोगे भैया?”
डॉक्टर बोले, “इसका उत्तर नहीं दे सकूंगा बहिन। मैं हार मानता हूं। लेकिन तुम्हारे अतिरिक्त मुझे और किसी स्त्री से हार नहीं माननी पड़ी।”
भारती हंसती हुई बोली, “सुमित्रा जीजी से भी नहीं?'
“नहीं।”
बिछौना बिछ जाने पर डॉक्टर उस पर आ बैठे। भारती पास बैठकर बोली, “जाने से पहले एक बात और पूछूं तो क्या छोटी बहन का अपराध क्षमा होगा?”
“क्यों नहीं?”
“सुमित्रा जीजी आपकी कौन हैं?”
कुछ देर चुप रहने के बाद डॉक्टर ने मुस्कराते हुए कहा, “वह मेरी क्या है, इसका उत्तर जब तक वह स्वयं न दे तब तक जान लेने का कोई उपाय नहीं है। मैं तो जिस दिन उसे पहचानता भी नहीं था, उस दिन मैंने स्वयं अपनी पत्नी कहकर उसका परिचय दिया था। मैंने ही उसका नाम सुमित्रा रखा था। मैंने सुना है कि उसकी मां यहूदी थी, लेकिन पिता थे बंगाली ब्राह्मण। पहले वह एक सर्कस पार्टी के साथ जावा गए थे, फिर सरवाया रेल के स्टेशन पर नौकरी करने लगे। जब तक वे जीवित रहे सुमित्रा मिशनरी स्कूल में पढ़ती रही। उनके मर जाने के बाद पांच-छह वर्ष के इतिहास को सुनने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं।”
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