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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती बोली, “नहीं भैया, मुझे सब बताओ।”
डॉक्टर ने कहा, “मैं भी सब नहीं जानता भारती। केवल इतना ही जानता हूं कि मां, बेटी, दो मामा, एक चीनी और दो मद्रासी मुसलमान मिलकर जावा में छिपे ढंग से गांजे के आयात-निर्यात का धंधा कर रहे थे। मैं नहीं जानता था कि वह लोग क्या करते हैं। बस यही देखा करता था कि बटासिया से सुरवाया तक ट्रेन द्वारा सुमित्रा अक्सर आया-जाया करती थी। अत्यंत सुंदर होने के कारण बहुत से लोगों की तरह मेरी नजर भी उस पर पड़ गई थी। बस सब कुछ यहीं तक सीमित था। लेकिन एक दिन अचानक ही परिचय हो गया तेगा स्टेशन के वेटिंग रूम में। यह बंगाली लड़की है इस बात का पता मुझे पहले-पहले नहीं चला।”
भारती ने कहा, “सुंदरी होने के कारण सुमित्रा जीजी को आप फिर भूल नहीं सके। यही बात है न भैया?”
डॉक्टर बोले, “एक दिन मैं जावा छोड़कर कहीं और चला गया और शायद उसे भूल ही गया। लेकिन एक वर्ष के बाद सहसा बेंकुलेन शहर की जेटी पर सुमित्रा से भेंट हो गई। एक बक्स में अफीम थी और सुमित्रा को घेरे चारों ओर पुलिस खड़ी थी। मुझे देखकर उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। मुझे संदेह नहीं रहा कि अब मुझे उसकी रक्षा करनी पड़ेगी। अफीम के बक्स को स्पष्ट अस्वीकार करके मैंने उसे अपनी पत्नी बता कर परिचय दे दिया। उसने यह नहीं सोचा था, इसलिए वह चौंक पड़ी। घटना सुमात्रा में हुई थी इसलिए मैंने उसका नाम सुमित्रा रख दिया। वैसे उसका वास्तविक नाम रोज दाऊद था। उन दिनों बेंकुलेन के मामलों-मुकदमों की सुनवाई पादांग शहर में होती थी। वहां मेरे घनिष्ठ मित्र थे पाल क्रूगर। उन्हीं के पास सुमित्रा को ले गया। मुकदमा चला। मजिस्ट्रेट ने सुमित्रा को रिहा कर दिया। लेकिन सुमित्रा ने मुझे रिहाई नहीं दी।”
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