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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती हंसकर बोली, “रिहाई अब मिलेगी भी नहीं भैया।”
डॉक्टर ने कहा, “धीरे-धीरे उसके दल के लोग समाचार पाकर ताक-झांक करने लगे। मैंने देखा, मेरे मित्र पाल क्रूगर भी उसके सौंदर्य पर लट्टू हो गए हैं। एक दिन उन्हीं के पास छोड़कर मैं चुपचाप खिसक गया।”
भारती बोली, “उन लोगों के बीच अकेली छोड़कर? तुम बहुत निर्दयी हो भैया।”
डॉक्टर बोले, “हां, अपूर्व की तरह। फिर एक वर्ष बीत गया। उन दिनों मैं सोलिवस द्वीप के मैकासर नगर के छोटे से अप्रसिद्ध होटल में रह रहा था। एक दिन शाम को कमरे में घुसते ही देखा, सुमित्रा बैठी है। हिंदू स्त्रियों की तरह टसर की साड़ी पहने। उसने एक हिंदू स्त्री की तरह झुककर प्रणाम किया और उठकर बोली, “मैं सब छोड़कर चली आई हूं। सम्पूर्ण अतीत को धो-पोंछकर फेंक आई हूं। मुझे अपने काम में शामिल कर लो। मुझसे बढ़कर विश्वसनीय साथिन दूसरी नहीं मिलेगी।”
भारती बोली, “उसके बाद?”
डॉक्टर ने कहा, “बाद की घटना....बस इतना ही कह सकता हूं कि सुमित्रा के विरुद्ध शिकायत करने का मुझे आज तक कोई कारण नहीं मिला। जो इक्कीस वर्षों के सभी संस्कारों को धो-पोंछकर, साफ करके आ सकती है उसके प्रति मेरे मन में श्रद्धा है लेकिन वह है बड़ी निष्ठुर।”
भारती की इच्छा हुई कि पूछे-'वह निष्ठुर हो सकती है लेकिन तुम उसको कितना प्यार करते हो।' लेकिन लाज के कारण पूछ न सकी। फिर उस रहस्यपूर्ण युवती के हृदय के गोपनीय इतिहास का आज उसे पता लग गया। उसका ममताहीन, मौन, रहस्यपूर्ण इतिहास - किसी का भी अर्थ समझना उसके लिए शेष नहीं रहा।
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