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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
सहसा डॉक्टर के मुंह से असावधानी से एक लम्बी सांस निकल गई। पल भर के लिए वह लज्जा से व्याकुल हो उठे, लेकिन उसी एक पल के लिए। दूसरे ही पल उनका शांत और सहज हास्यपूर्ण स्वर लौट आया। बोले, “उसके बाद सुमित्रा को साथ लेकर मुझे केंटन चला आना पड़ा।”
भारती हंसी छिपाकर बोली, “न आते भैया। तुम्हें सिर की शपथ किसने दी थी-बताओ? हम लोगों में से तो किसी ने दी-नहीं थी।”
“सिर की शपथ किसी ने नहीं दी, ऐसी बात नहीं है। लेकिन मैंने सोचा था कि वह बात किसी को भी मालूम न हो सकेगी। लेकिन तुममें एक दोष यह है कि अंत तक न सुनने से तुम्हारी जिज्ञासा शांत नहीं होती और न सुनाने से तुम बहुत-सी ऐसी ही बातों का अनुमान करती रहोगी। इसलिए सुना देना ही अच्छा है।”
“मैं भी यही कह रही हूं भैया।”
डॉक्टर बोले, “बात यह है कि सुमित्रा ने मेरे ही होटल की दूसरी मंजिल पर एक कमरा किराए पर ले लिया। मैंने बहुत मना किया। लेकिन वह नहीं मानी। तब मैंने कहा, ऐसी हालत में मुझे यहां से चला जाना होगा।' यह सुनकर उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। बोली, 'आप मुझे आश्रय दीजिए।' दूसरे ही दिन मामला समझ में आ गया। दाऊद का गैंग वहां दिखाई पड़ा। उस गैंग में लगभग दस आदमी थे। उनमें से एक आधा अरब और आधा नीग्रो था। छोटे-मोटे हाथी की तरह। वह अनायास ही दावा कर बैठा कि सुमित्रा उसकी पत्नी है।”
भारती बोली, “और तुम्हारे ही सामने! उन दोनों में शायद खूब झगड़ा हुआ?”
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