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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर बोले, 'हां। सुमित्रा ने अस्वीकार करते हुए कहा, 'सब झूठ है। एक षडयंत्र है।'-असल में वह लोग उसे चोरी की अफीम बेचने के काम में वापस ले जाना चाहते थे। प्रशांत महासागर के सभी द्वीपों में उनके अड्डे हैं। गैंग काफी बड़ा है जिसमें बदमाश लोग शामिल हैं। कोई भी ऐसा काम नहीं है जिसे यह लोग न कर सकते हों। मैं जान गया कि यह समस्या आसानी से नहीं सुलझेगी। लेकिन विलम्ब उन्हें सह्य नहीं था। वह तत्काल निर्णय करके सुमित्रा को खींच ले जाना चाहते थे। मैंने उन्हें रोका। पुलिस बुलाकर गिरफ्तार कराने का डर दिखाया। तब वह लोग गए। लेकिन धमकी देते गए कि उन लोगों के हाथ से आज तक कोई नहीं बचा।”
“उसके बाद?'
डॉक्टर ने कहा, “रात को सावधान रहा। मैं जानता था कि वह लोग दल-बल के साथ लौटकर आक्रमण करेंगे।”
भारती ने पूछा, “भाग क्यों नहीं गए? पुलिस को खबर क्यों नहीं दी? डच सरकार के पास क्या पुलिस नहीं है?”
डॉक्टर ने कहा, “थाना-पुलिस में जाना मेरे लिए निरापद नहीं था। लेकिन वह रात शांतिपूर्वक बीत गई । वहां समुद्र के किनारे-किनारे चलने वाली व्यापारिक नावें मिलती हैं। अगले दिन एक नाव ठीक कर आया। लेकिन सुमित्रा को बुखार आ गया। वह उठ न सकी। काफी रात बीते दरवाजा खुलने की आवाज से नींद टूट गई। खिड़की से झांककर देखा, दरवाजा होटल वाले ने खोला है और दस आदमी होटल में घुस रहे हैं। वह चाहते थे कि मेरे कमरे के दरवाजे को बाहर से बंद कर दें और बगल की सीढ़ी से ऊपर सुमित्रा के कमरे में चले जाएं।”
भारती सांस रोककर बोली, “उसके बाद?”
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