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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


डॉक्टर बोले, “मैंने दरवाजा खोलकर ऊपर जाने की सीढ़ी रोक ली।”

भारती का चेहरा पीला पड़ गया। बोली, “उसके बाद?”

डॉक्टर ने कहा, “उसके बाद की घटना अंधेरे में घटी, इसलिए ठीक-ठीक नहीं बता सकूंगा। लेकिन अपनी बात मुझे मालूम है। एक गोली मेरे बाएं कंधे में लगी, दूसरी घुटनों के बीच। सवेरा होते ही पुलिस आ गई। पहरा लग गया। गाड़ी आई और पुलिस छह-सात आदमियों को उठा ले गई। होटल वालों ने गवाही दी कि डाकुओं ने धावा बोला था। अंग्रेजी राज्य होता तो मामला कितनी दूर पहुंचता और क्या होता, नहीं कहा जा सकता। लेकिन सेलिवरु के कानून-कायदे दूसरे ही हैं। मरे हुए लोगों की जब शिनाख्त नहीं हुई तो शायद उन्हें कहीं गाड़-गूड़ दिया।”

“तुम्हारे हाथ से क्या इतने आदमी मारे गए?”

“मैं तो नाम मात्र था। वह तो अपने हाथों ही मारे गए समझो।”

भारती चुप बैठी रही।

डॉक्टर बोले, “उसके बाद कुछ दूर नाव से, कुछ दूर घोड़ा गाड़ी से, और कुछ दूर स्टीमर से हम लोग मेकड़ा शहर में पहुंच गए। वहां से नाम-धाम बदलकर एक चीनी जहाज से केंटन चले गए। आगे शायद तुम्हें सुनने की इच्छा नहीं है। तुम्हें केवल यही लग रहा है कि भैया के हाथों में भी मनुष्य का खून लगा हुआ है।”

भारती ने कहा, “मुझे डेरे पर पहुंचा दीजिए भैया?”

“इसी समय जाओगी?”

“हां, मुझे पहुंचा आओ।”

“चलो”, यह कहकर उन्होंने फर्श से एक तख्ता हटाकर कोई चीज चुपके से निकालकर अपनी जेब में रख ली। भारती समझ गई कि यह पिस्तौल है। पिस्तौल उसके पास भी थी। सुमित्रा के आदेश के अनुसार वह उसे बाहर जाते समय अपने साथ रखती थी। यह ज्ञान उसे आज पहली बार हुआ कि यह मनुष्यों को मार डालने का यंत्र है।

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