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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
नाव पर भारती ने धीरे-धीरे कहा, “तुम जो भी क्यों न करो, तुम्हारे अतिरिक्त मेरे लिए पृथ्वी पर आश्रय नहीं है, जब तक मेरे मन की अशांति नहीं मिट जाती तुम तब तक मुझे छोड़कर नहीं जा सकते भैया। बोलो, जाओगे तो नहीं?'
डॉक्टर ने कहा, 'अच्छा, ऐसा ही होगा बहिन!”
नाव पर बैठी हुई भारती मन-ही-मन न जाने कितनी बातें सोचती रही। उसके मन पर सबसे जबर्दस्त धक्का लगाया सुमित्रा के इतिहास ने। उसके प्रथम यौवन की दुर्भाग्यपूर्ण अनोखी कहानी ने। सुमित्रा को मित्र समझने का दुस्साहस कोई भी स्त्री नहीं कर सकती। भारती उसे प्यार नहीं कर सकी है। लेकिन सब बातों में उसकी असामान्य श्रेष्ठता के कारण उसने अपने हृदय की भक्ति उसे अर्पित की थी। लेकिन उस दिन, अपूर्व का अपराध कितना भी भयंकर क्यों न हो, नारी होकर एकदम सहज भाव से उसकी हत्या करने का आदेश देने के कारण उसकी वह भक्ति भीषण भय में परिवर्तित हो गई। भारती अपूर्व को कितना प्यार करती है यह बात सुमित्रा से छिपी नहीं थी। प्रेम क्या है, यह बात भी उससे छिपी नहीं है फिर भी एक नारी के प्रेमी को प्राण-दंड देने में नारी होकर भी उसे रत्ती भर हिचक नहीं हुई। वेदना की आग से छाती के भीतर जब इस प्रकार की ज्वाला भक-भक जलने लगती तब वह अपने को यह कहकर समझा लेती किकर्त्तव्य के प्रति इस तरह निर्मम निष्ठा न होने पर पथ के दावेदारों की अध्यक्षा कौन बनती?”
नाव के घाट पर पहुंचते ही एक आदमी पेड़ की आड़ से निकलकर सामने आ खड़ा हुआ। उसे देखते ही भारती के पांव भय से कांप उठे।
डॉक्टर ने बड़ी नर्मी से कहा, “यह तो अपना हीरा सिंह है। तुमको पहुंचा देने के लिए खड़ा है। क्यों हीरा सिंह जी, सब ठीक है न?”
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