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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
हीरा सिंह ने कहा, “सब ठीक है।'
“क्या मैं भी चल सकता हूं?”
हीरा सिंह बोला, “आपके जाने से क्या कोई रुकावट डाल सकता है?”
समझ में आ गया कि पुलिस वाले भारती के मकान पर निगाह रख रहे हैं। डॉक्टर का जाना निरापद नहीं है।
भारती चुपके से बोली, “मैं नहीं जाऊंगी भैया।”
“लेकिन तुम्हें भागकर छिपने की जरूरत नहीं भारती।”
“जरूरत पड़ने पर भाग सकूंगी। लेकिन इनके साथ नहीं जाऊंगी।”
डॉक्टर इस आपत्ति का कारण समझ गए। अपूर्व के मामले के विचार के दिन हीरा सिंह ही उसे धोखे से ले आया था। कुछ सोचकर बोले, “तुम तो जानती हो भारती, कितना खराब है मुहल्ला। इतनी रात गए तुम्हारा अकेली जाना ठीक नहीं है। और मैं.....।”
व्याकुल स्वर में भारती बोली, “नहीं भैया, तुम मुझे पहुंचा दो। मैं पागल नहीं हूं जो....?”
हाथ छोड़कर भारती को नाव से उतरते न देखकर डॉक्टर ने स्नेहिल स्वर में कहा, “वहां तुम्हें वापस ले जाते हुए मुझे भी लज्जा मालूम होती है। क्या दूसरी जगह चलोगी, जहां हमारे कवि जी रहते हैं? वह नदी के उस पार रहते हैं।”
भारती ने पूछा, “कौन कवि भैया?”
“हमारे उस्ताद जी, बेहला बजाने वाले....!”
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