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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने प्रसन्न होकर कहा, “वह क्या घर पर मिलेंगे? अगर अधिक शराब पी गए होंगे तो कहीं बेहोश पड़े होंगे।”
डॉक्टर बोले, “इसमें आश्चर्य नहीं। लेकिन मेरी आवाज सुनते ही उनका नशा हिरन हो जाता है। नवतारा उनके पास ही रहती है। सम्भव है तुम्हें कुछ खिलवा भी सकूं।”
भारती बोली, “इस ढलती रात में मुझे खिलाने की चेष्टा मत करो, चलो, वहां चलें। सवेरा होते ही लौट आएंगे।”
डॉक्टर नाव चलाने लगे तो हीरा सिंह अंधेरे में गुम हो गया।
भारती ने आश्चर्य से पूछा, “भैया, क्या पुलिस इस आदमी पर संदेह नहीं करती?”
डॉक्टर बोले, “नहीं। यह तारघर का चपरासी है। लोगों के जरूरी तार उनके घर पहुंचाया करता है। इसलिए दिन हो या रात, किसी भी समय उसका आना-जाना संदेहजनक नहीं होता।”
ज्वार अभी-अभी शुरू हुआ है। धीरे-धीरे बड़ी सावधानी से लग्गी ठेलते हुए नाव ले जाने के परिश्रम का अनुमान करके भारती ने जल्दी से कहा, “वहां जाने की जरूरत नहीं। चलिए आपके घर लौट चलें। ज्वार के खिंचाव में आधा घंटा भी नहीं लगेगा।”
डॉक्टर ने कहा, 'केवल इसी काम से नहीं भारती, एक और विशेष काम से उससे मिलना चाहता हूं।”
भारती व्यंग्य भरी हंसी के साथ बोली, “उनसे किसी आदमी को कोई काम हो सकता है, इस पर मुझे विश्वास नहीं होता।”
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