|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर कहने लगे, “तुम उसे नहीं जानती भारती, उस जैसा सच्चा गुणवान आदमी तुम्हें कहीं नहीं मिल सकता। अपने टूटे बहले की ही पूंजी के बल पर कोई ऐसा स्थान नहीं जहां वह न पहुंचा हो। इसके अतिरिक्त वह बहुत बड़ा विद्वान है। किस पुस्तक में कहां क्या लिखा है-बताने वाला मेरे परिचितों में उस जैसा दूसरा कोई भी नहीं है। उसे मैं वास्तव में प्यार करता हूं।”
भारती मन-ही-मन अप्रतिभ होकर बोली, “तब तुम उसकी शराब पीने की आदत छुड़ाने की कोशिश क्यों नहीं करते?”
डॉक्टर ने कहा, “मैं किसी से कुछ छुड़वाने की कोशिश नहीं करता भारती। वह कवि हैं। उन लोगों की जाति ही अलग होती है। उनके भले-बुरे काम हम लोगों से मेल नहीं खाते, लेकिन इस कारण संसार के भले-बुरे कामों के लिए बने कानून उन्हें क्षमा नहीं करते। उनके गुणों का तो सभी लोग मिलकर उपभोग करते हैं, लेकिन अपने दोषों के लिए वह अकेले ही दंड भोगते हैं। इसलिए कभी-कभी जब वह बेचारा बहुत कष्ट पाता है, जब ऐसा व्यक्ति जो उसके दु:ख का मन-ही-मन सहयोगी होता है, वह मैं हूं।”
भारती बोली, “तुम सभी के लिए दु:ख अनुभव करते हो भैया। तुम्हारा मन तो स्त्रियों के मन से भी कोमल है। लेकिन अपने उस गुणवान पर विश्वास कैसे करते हो? शराब के नशे में वह सब कुछ प्रकट भी तो कर सकते हैं?”
डॉक्टर बोले, “केवल इतना ज्ञान ही तो उसमें बचा है। फिर उसकी बातों पर कोई अधिक विश्वास भी तो नहीं करता?”
भारती ने पूछा, “उनका नाम क्या है भैया?”
डॉक्टर ने कहा, “अतुल, सुरेन, धीरेन-जब जो नाम मन में आ जाए। -वास्तविक नाम है-शशिपद भौमिक।”
|
|||||

i 








