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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
“शायद वह नवतारा के कहने पर चलते हैं?
यह कहकर डॉक्टर ने नाव घूमा दी। पानी के तेज बहाव के कारण छोटी-सी नाव बहुत तेजी से चलने लगी और देखते-ही-देखते उस पार जा लगी। भारती का हाथ पकड़कर डॉक्टर नाव से उतर पडे। आगे बढ़ने पर एक तंग रास्ता मिला। उसके आस-पास पानी से भरे छोटे-बड़े गङ्ढे थे। उनके बीच से वह रास्ता अंधेरे में चला गया था।
भारती ने कहा, “भैया, फिर वैसी ही भयानक जगह में ले आए। बाघ-भालुओं की तरह ऐसे स्थान के अतिरिक्त तुम लोग और कहीं भी रहना नहीं जानते? और किसी से भले ही न डरो, सांपों से तो डरो।”
डॉक्टर हंसकर बोला, “सांप तो विलायत से नहीं आए बहिन। उनमें धर्म ज्ञान है। अपराध न करने वाले को वह नहीं काटते।”
यह सुनकर भारती को एक दिन की बात याद आ गई। उस दिन उनके ऐसे ही हास्य पूर्ण स्वर में यूरोप के विरुद्ध कितनी असीम घृणा प्रकट हो गई थी। उन्होंने फिर कहा, “बाघ-भालुओं की बात कहती हो बहिन। मैं अक्सर ही सोचा करता हूं कि इन्सान न रहकर अगर यहां बाघ-भालू ही रहते तो सम्भव है यह लोग शिकार करने विलायत से यहां आया करते। और रात-दिन खून चूसने के लिए यहां चिपककर पड़े रहते।”
भारती मौन रही। सारी जाति के विरुद्ध इतना बड़ा विद्वेष उसे व्यथित कर देता था। मन-ही-मन कह उठती थी - यह कभी भी सच नहीं हो सकता। ऐसा हो ही नहीं सकता।
सहसा डॉक्टर ठिठककर खड़े हो गए, बोले, “हमारे उस्ताद जी जाग रहे हैं, और होश में हैं। ऐसा बेहला तुमने कभी नहीं सुना होगा भारती!”
कुछ आगे बढ़कर भारती रुक गई। उसकी उत्सुकता निरंतर बढ़ती चली जा रही थी। उसका न कोई आदि था न अंत। इस संसार में उसकी तुलना नहीं हो सकती। दो मिनट के लिए मानो भारती को होश ही नहीं रहा।
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