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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने उसके हाथों से जरा-सा दबाकर कहा, “चलो।”
भारती बोली, “चलो। मैंने ऐसा कभी नहीं सुना था।”
डॉक्टर बोले, “मैंने भी इससे अच्छा कभी नहीं सुना। लेकिन इस पागल के हाथों में पड़कर उस बेचारे बेहला की दुर्दशा का अंत नहीं है। मैंने ही शायद दसियों बार उसका उद्धार किया होगा। सुना है, अपूर्व के पास पांच रुपए में गिरवी रखा हुआ था।”
भारती बोली, “मैं उनके नाम रुपए भेज दूंगी।”
पेड़ों की ओट में एक दो मंजिला मकान है। नीचे की मंजिल पर कीचड़ ज्वार के पानी और जंगली पौधों ने अधिकार कर रखा है। सामने काठ की एक सीढ़ी है। और उसी के सबसे ऊंचे स्थान पर एक तोरण-सा बना हुआ है। उसी पर एक बहुत बड़ी रंगीन चीनी लालटेन लटकी है जो झूलती दिखाई दे रही है। उसकी रोशनी में स्पष्ट दिखाई दिया, उसके ऊपर बड़े-बड़े काले अंग्रेजी अक्षरों में लिखा हुआ है- “शशितारा लॉज।”
भारती ने कहा, “मकान का नाम रखा है 'शशितारा लॉज', लॉज तो समझ गई। लेकिन शशितारा का क्या अर्थ है?”
डॉक्टर मुस्कराकर बोले, “शायद शशिपद का शशि और नवतारा का तारा मिलकर शशितारा बन गया है।”
भारती बोली, “यह अन्याय है। अन्याय को तुम प्रश्रय क्यों देते हो?”
डॉक्टर हंसकर बोले, “तुम क्या अपने भैया को सबसे शक्तिमान समझती हो? कोई अपने लॉज का नाम शशितारा रखे या कोई पैलेस का नाम अपूर्व भारती रखे - मैं कैसे रोक सकूंगा।”
भारती क्रोधित होकर बोली, “नहीं भैया, इन सब गंदे कामों के लिए उन्हें मना कर दो। वरना मैं उनके घर नहीं जाऊंगी।”
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