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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर बोले, “सुना है, दोनों का विवाह होने वाला है। भाग्य प्रसन्न हो तो मरने में कितनी देर लगती है बहिन! सुना है पंद्रह दिन हुए वह मर गया।”
दु:खी होते हुए भी भारती हंस पड़ी, “शायद यह खबर झूठी है। अगर सच भी है तो कम-से-कम एक वर्ष तक तो उन्हें रुकना ही चाहिए। नहीं तो यह काम बहुत ही अशोभनीय होगा।”
डॉक्टर बोले, “अच्छी बात है, कहकर देखूंगा। लेकिन रुकने से अशोभनीय दिखाई देगा या न रुकने से - यह सोचने की बात है।”
इस संकेत से भारती लज्जित होकर चुप हो गई। सीढ़ी पर चढ़ते हुए डॉक्टर बोले, “इस पागल के लिए ही मुझे कष्ट होता है। सुना है, उस स्त्री को बहुत प्यार करता है। लेकिन संसार के भले-बुरे की फरमाइश, मित्रों की अभिरुचि - यह सब बातें अत्यंत तुच्छ हैं भारती। मैं तो केवल इतनी ही कामना करता हूं कि उसके प्रेम में यदि सच्चाई हो तो यह सच्चाई ही उसका उद्धार करे।”
भारती ने चौंककर पूछा, “संसार में क्या ऐसा भी होता है भैया।”
तभी वह दोनों बंद दरवाजे के सामने पहुंचकर रुक गए।
बेहला बजना बंद हो गया। थोड़ी देर बाद दरवाजा खोलकर शशिपद बाहर आए तो सहज ही डॉक्टर को पहचान लिया। फिर भारती को पहचानते ही एकाएक उछलकर बोले, “आप?.... भारती? आइए, आइए।”
यह कहकर उन्हें अंदर ले गए। उनके आनंद से चमकते चेहरे की कपट रहित अभ्यर्थना से, उनके अकृत्रिम उत्साह भरे स्वागत से भारती का सारा क्रोध हवा हो गया। शशि ने बिस्तर के किसी कोने से एक बड़ा-सा लिफाफा निकाल भारती के हाथ में देकर कहा, “खोलकर पढ़िए। परसों दस हजार रुपए का ड्राफ्ट आ रहा है - नाट ए पाई लैस - मैं कहा करता था कि मैं जुआरी हूं, झूठा हूं, शराबी हूं। कैसे हो गया यह? दस हजार! नाट ए पाई लैस।”
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